क्या फ़िल्में सचमुच समाज की असलियत सामने लाती हैं? मुझे तो ऐसा लगता है कि करोड़ों की लागत से बनने वाली फ़िल्मों में असलियत को छिपाने का ही काम किया जाता है।
हमारे समाज में ऊँच-नीच, शोषण आदि का यथार्थ चित्रण करने में फ़िल्मकार या तो असमर्थ होते हैं या किसी दबाव के कारण वे ऐसा नहीं कर पाते हैं। मैं यह नहीं मानता हूँ कि मनोरंजन और सार्थकता का मेल संभव ही नहीं है।
ऐसा क्यों होता है कि 'हम आपके हैं कौन', 'मैंने प्यार किया' जैसी फ़िल्मों में ऐसा जीवन दिखाया जाता है जो हर दृष्टि से प्रगतिशील मूल्यों के विरोध का प्रतिनिधित्व करता है। इन फिल्मों के नौकर अपने मालिकों को अपने माँ-बाप से ज़्यादा सम्मान देते हैं और मालिक उन्हें घर के सदस्य का दर्जा देते हैं। क्या भारतीय समाज में सचमुच ऐसा होता है? क्या ऐसी फ़िल्में उन मूल्यों को बढ़ावा देने का काम नहीं करती हैं जिनके कारण हमारा समाज आज भी पिछड़ा हुआ है?
अधिकतर हिंदी फ़िल्मों में ऐसी बातों को बढ़ावा दिया जाता है जिन्हें समाज का 'खाया-पीया-अघाया' वर्ग अपने लिए फ़ायदेमंद मानता है। अगर इन फ़िल्मों में दिखाई गई दुनिया को सच मानें तो हमें आर्थिक शोषण, जाति प्रथा, दहेज आदि को झूट मानना होगा। सच क्या है यह तो आप और हम जानते ही हैं। फ़िर ऐसा क्यों होता है कि फ़िल्मों में जान-बूझकर ऐसे मुद्दों से बचा जाता है। क्या इसकी वजह यह तो नहीं है कि फ़िल्म निर्माण से जुड़ा शक्तिशाली वर्ग अपने स्वार्थ के कारण प्रगतिशील मूल्यों को बढ़ावा नहीं देना चाहता है?
'हम आपके हैं कौन' जैसी फ़िल्मों में लोग इतने खुश नज़र आते हैं कि हर दस मिनट के बाद वे ढोलक लेकर नाचने लगते हैं। जिन मूल्यों और परंपराओं को इन फ़िल्मों में दिखाया जाता है वे आज के समाज की असलियत नहीं हैं। जीवन की जटिलताओं के सरलीकरण के कारण ये फ़िल्में प्रायोजित संस्कृति का उत्पाद बनकर रह जाती हैं। फ़िल्मों में पात्र के पेशे से जुड़े विवरण पूरी तरह गायब रहते हैं। समाज का निचला वर्ग अपने पेशे के कारण हर दस मिनट में ढोलक लेकर नाचने की मन:स्थिति में नहीं होता है। कम उम्र की नौकरानियाँ जब मालकिन से पिटकर अस्पताल में भर्ती होती हैं तब हमें मीडिया से इनके बारे में पता चलता है। फ़िल्मों में इनके जीवन के तमाम संघर्षों के ऊपर मालिक के प्यार का आवरण होता है। इस आवरण की ज़रूरत क्यों महसूस की जाती है? आइए, आप भी इस सवाल का जवाब ढूँढ़ने में मेरी मदद करें।
Stop the Cycle of Revenge and Violence in West Bengal
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This public statement is for immediate release. Please see the names of the
signatories at the end. The news of continuous violence on a daily basis
comin...
15 घंटे पहले








1 टिप्पणियाँ:
आपका पहला अनुच्छेद ही सब कुछ बहुत साफ कर रहा है। इससे अधिक स्पष्ट सत्य नहीं कहा जा सकता।
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