Monday, March 30, 2009

जब रामू काका है तो मेहनत क्यों?

कुछ दिन पहले एक विज्ञापन में किसी को यह कहते सुना : "जब रामू काका है तो मेहनत क्यों? जब सॉरी है तो ..." मेरे दिमाग में यह बात आई कि इस विज्ञापन के आधार पर हर उस व्यक्ति को मेहनत नहीं करनी चाहिए जिसके घर में कोई 'रामू काका' है। ऐसे विज्ञापनों से समाज को कैसा संदेश दिया जा रहा है? क्या मेहनत करना सिर्फ़ 'रामू काका' का काम है? क्या बाकी लोगों को सॉरी, थैंक्यू कहते हुए ही अपनी ज़िंदगी काटनी चाहिए?

दरअसल, इस स्थिति के लिए हमारा समाज जिम्मेदार है। कोई ऐसे विज्ञापनों पर सवाल नहीं उठाता है।

पहले रेडियो पर गानों के कार्यक्रम में दो-चार विज्ञापन आते थे। अब स्थिति यह हो गई है कि विज्ञापनों के बीच एक-दो गाने सुनने को मिल जाते हैं। विज्ञापनों का स्तर बहुत गिर गया है।

Wednesday, March 25, 2009

प्राइवेट स्कूलों का नरक

प्राइवेट स्कूल का मेरा अनुभव इतना खराब है कि मैं तो पूरे देश में शिक्षा की इन दुकानों को बंद करवाना चाहूँगा।अंग्रेज़ी और सत्ता के घालमेल से उपजी इन दुकानों की घृणित हरकतों का अंदाज़ा तो इन खबरों से ही लग जाता है:

http://khabar.josh18.com/news/10369/3

http://khabar.ndtv.com/2009/02/28134202/Delhi-school-280209.html

इन स्कूलों में पढ़ाई के स्तर की सच्चाई तो मैं एक छात्र के रूप में भी जान चुका हूँ। जब एक शिक्षक पर दो सौ लड़कों की जिम्मेदारी होती है, तो हर छात्र खुद को उपेक्षित महसूस करता है। सीबीएससी की मान्यता के नाम पर ये स्कूल लाखों-करोड़ों कमा रहे हैं, लेकिन छात्रों के हितों से इनका कोई लेना-देना नहीं होता है।

पटना के एक प्राइवेट स्कूल में बड़े अरमानों के साथ दाख़िला लेने के बाद बहुत जल्दी मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया। इस स्कूल में छोटे कमरे में 50-60 छात्रों को पढ़ाया जाता था। हर क्लास में 4-5 सेक्शन होते थे। टीचरों को बच्चों की पढ़ाई से कोई लेना-देना नहीं था। वे क्लास में आते, यंत्रवत् पढ़ाते और किसी के कुछ पूछने पर डाँटने, खीझने आदि का हथकंडा अपनाकर प्रश्न को टालने की कोशिश करते।

इस स्कूल को सीबीएससी की मान्यता कैसे मिली थी, यह आज भी मेरे लिए एक बहुत बड़ा रहस्य है! आज ऐसे स्कूल हर शहर में खुल गए हैं। इन स्कूलों में छात्रों और उनके माता-पिताओं का हर तरह से शोषण किया जाता है।पैसे कमाने के लिए ये 5 रू. की कॉपी को 50 रू. में बेचने से लेकर हर साल बेतहाशा फ़ीस बढ़ाने तक कोई भी हथकंडा अपना सकते हैं।

जिस स्कूल में मैं पढ़ा था, उसके होस्टल में ककड़ वाली ऐसी दाल मिलती थी जो शायद जेल की दाल से भी बदतर थी। लड़कों को एक बड़े हॉल में सोना पड़ता था। हर जगह गंदगी रहती थी और स्कूल वालों को सिर्फ़ पैसों से मतलब रहता था।

वैसे यह एक बहुत बड़ा सच है कि जो समाज शिक्षा, भाषा आदि विषयों के संदर्भ में जागृत नहीं है, उसमें बच्चों को इस नरक से गुजरना ही पड़ेगा।

Thursday, July 3, 2008

अरे, तुम तो अपनी जाति के निकले!

जे.एन.यू. के बारे में सुना था कि यहाँ लोग कुछ अलग तरह से सोचते हैं। यह जानकर अच्छा लगा था कि मैं ऐसी जगह आ गया हूँ जहाँ आधुनिक व मानवतावादी मूल्यों को महत्त्व दिया जाता है। मगर मेरी यह धारणा गलत निकली। यहाँ के अधिकतर छात्र जाति और धर्म के आधार पर बँटे हुए हैं। यह जातिवाद होस्टल के मेस में भी दिखता है। कम-से-कम मेरे होस्टल में तो ऐसा ही था। ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार वगैरह एक साथ बैठकर खाते थे। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्र दूसरी जगह बैठते। मुसलमानों के बैठने की जगह दूसरी थी। यह विभाजन सबको स्वाभाविक लगता ! किसी ने यह नहीं पूछा कि लड़के अपने सेंटर या स्कूल के साथियों के साथ क्यों नहीं बैठते हैं!

यहाँ के चुनाव में जाति और धर्म बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। चीन, अमेरिका आदि की बात करते हुए सबकी नज़र वोट पर ही रहती है। अनेक छात्र वोट देते समय आपसी फायदे को राजनीतिक विचारधारा से अधिक महत्त्व देते हैंवोट की इस राजनीति में झूट, दबाव और चापलूसी की मदद से काम निकालने में कोई किसी से पीछे नहीं होता है

कैंपस में जातिगत टिप्पणी करने वालों की कमी नहीं हैयहाँ मारपीट की ऐसी कई घटनाएँ हुईं हैं जिनमें जाति के नाम पर गाली-गलौज की गईकुछ लोग यह कहते हैं कि भारत में अब जातिवाद का अस्तित्व नहीं के बराबर हैऐसा कहने वालों को जे.एन.यू. आकर यह अच्छी तरह मालूम हो जाएगा कि भारत में जातिवाद का जहर किस हद तक फैल चुका है

पहले मैंने सिर्फ़ यह सुना था कि एक जाति-विशेष के अधिकतर छात्र हर होस्टल में अपनी जाति के छात्र से परिचित होते हैं। बाद में जब मैंने ख़ुद अपनी आंखों से यह सब देखा तब मुझे जाति के इस अद्भुत भाईचारे को देखकर बहुत आश्चर्य हुआ। यही भाईचारा अगर जाति के आधार पर नहीं होकर केवल छात्र होने के नाते होता, तो हमारा देश आज कितना आगे होता!

मैंने यह भी महसूस किया कि दलित उद्धार के नाम पर कई छात्र जातिवाद को और अधिक बढ़ावा देते हैं। ये लोग अलग-थलग रहकर जातिवाद की जड़ों को मजबूत बनाते हैं। क्या जाति की अवधारणा को पूरी तरह नकारकर इस जहर को समाज से बाहर निकाल फेंकने के बदले अपनी जाति को स्वीकार करते हुए वोट की राजनीति करना सही है? क्या इनके लिए यह कहना असंभव है कि हम किसी जाति-वाति में यकीन नहीं करते। ये लोग ऐसा कहने के बदले यह कहते हैं कि हमारी यह जाति है और हम इस जाति के स्वाभिमान की रक्षा करते हुए किसी सीमा तक जा सकते हैं। क्या ऐसा करते हुए ये लोग जातिवाद की अवधारणा को अपना अप्रत्यक्ष समर्थन नहीं देते हैं?


Monday, June 30, 2008

इंग्लैंड में महिला बिशपों की नियुक्ति का विरोध

यह ख़बर इक्कीसवीं सदी की है! इंग्लैंड के चर्च का एक पादरी-वर्ग चर्च में महिला बिशपों की नियुक्ति के लिए कानून बनाने का विरोध कर रहा है। जब इंग्लैंड जैसे विकसित देश में ऐसा हो सकता है, तो अन्य पिछड़े देशों के बारे में क्या कहा जाए?

विरोध कर रहे पादरी-वर्ग का यह कहना है कि अगर महिला बिशपों की नियुक्ति का कानून बना तो वे चर्च से किसी तरह का संबंध नहीं रखेंगे। विरोध-पत्र पर १३०० से अधिक पादरियों ने हस्ताक्षर किए हैं। उन्होंने इस कानून को एक शर्त पर अपना समर्थन देने की बात की है। इस शर्त के तहत वह चर्च में पुरुषों के लिए अलग उपासना कक्ष की मांग कर रहे हैं।

संसार के किसी धर्म में महिलाओं को बराबरी का दर्जा नहीं दिया गया है। हर धर्म में उसे पुरुषों से कमतर बताया गया है और समाज आज भी धर्म की आड़ में महिलाओं का शोषण कर रहा है। महिला बिशपों की नियुक्ति से आम महिला पर कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ने वाला है, लेकिन इसके विरोध के पीछे छिपी पुरुषवादी सोच की जितनी निंदा की जाए वो कम है।

सबसे दुःख की बात तो यह है कि सदियों से जिन धर्मों ने महिलाओं का शोषण किया है, उन्हें आगे बढ़ाने में महिलाओं की अच्छी-खासी भूमिका रही है। सदियों की गुलामी के कारण अधिकांश महिलाओं को अपने जीवन की असलियत को जानने का मौका भी नहीं मिल पाता है। वे अपने आँगन की सीमा को लांघकर बाहर के संसार को समझने का प्रयत्न भी नहीं कर पाती हैं। बचपन से ही उन्हें "आदर्श नारी" बनने का घरेलू प्रशिक्षण दिया जाता है। किसी बच्ची के सामने एक झूट को सौ बार कहने से बच्ची उसे सच मान लेती है और इसका परिणाम यह होता है कि बड़ी होने पर वे उन्हीं बातों को बढ़ावा देने लगती हैं जो उनकी गुलामी सुनिश्चित करती हैं।

क्या महिला बिशपों को उस व्यवस्था में घुटन का अहसास नहीं होता होगा जहाँ उनके साथ इतना भेदभाव होता है? इसका उत्तर तो वे ही दे सकती हैं, मगर मैं तो बस इतना कहना चाहूँगा जब तक महिलाएं धर्म की राजनीति को नहीं समझ पाएंगी, तब तक "पवित्र" जंजीरें उन्हें सार्थक जीवन से वंचित करती रहेंगीं।


Thursday, June 26, 2008

औरतों के "औरतीकरण" में कहानियों का योगदान

क्या आपने कभी यह सोचा है कि बचपन में दादी-नानी से सुनी गई कहानियाँ छोटे बच्चों के मन पर नकारात्मक प्रभाव भी डाल सकती हैं? ये कहानियाँ कल्पना की उड़ान-मात्र नहीं हैं।

मैं यहाँ सिर्फ़ भारत के प्रसंग में बात नहीं कर रहा हूँ। इन कहानियों में पूरी मानवता का सच छिपा होता है। इन कहानियों की दुनिया अविश्वसनीय लगती है, लेकिन इनमें जीवन का यथार्थ अपने बदले हुए रूप में होता है।

इन कहानियों में औरतों और लड़कियों के वर्णन पर गौर करने से बहुत-सी बातें सामने आती हैं। हमारे समाज में औरतों से यह अपेक्षा रखी जाती है कि वे आज्ञाकारिता, सेवा, विनम्रता आदि गुणों को अपने जीवन में सबसे अधिक महत्त्व दें। पुरुषों से कार्यकुशल, साहसी, समझदार आदि होने की अपेक्षा रखी जाती है। बच्चों को सुनाई जाने वाली कहानियों में औरतों को उसी रूप में प्रस्तुत किया जाता है जिसे समाज अपने लिए सुविधाजनक मानता है। सिमोन दी बोउआ ने कहा था कि औरतें पैदा नहीं होती, बल्कि बना दी जाती हैं । अगर आप कम उम्र की लड़की को ऐसी कहानियाँ सुनाएंगे जिसमें औरतों की आज्ञाकारिता और पुरुषों की कार्यकुशलता का वर्णन हो, तो आप उसे ऐसी औरत बनाने में पूरी तरह तरह सफल हो जाएंगे जिसे समाज "आदर्श बहू", "आदर्श बेटी" आदि कहकर बुलाएगा। यह औरत अपने व्यक्तित्व को पूरी तरह अपने परिवार में विलीन कर देगी। बच्चों की कहानियों में औरतों के वर्णन पर नीचे विचार किया गया है:

  1. अन्याय सहने वाली औरत: सिंड्रेला जैसी कहानियो में औरतों को बिल्कुल कमजोर दिखाया गया है। अपनी सौतेली माँ और बहनों की डांट-फटकार सुनने के बाद भी सिंड्रेला कुछ नहीं कहती है। वह चुपचाप अपने काम में लगी रहती है। अपनी परिस्थिति में बदलाव लाने के लिए वह कोई प्रयत्न नहीं करती है। उसके जीवन में सकारात्मक बदलाव तब आता है जब जादुई शक्ति से उसके कपड़े राजकुमारी जैसे हो जाते हैं। उन कपड़ों में वह इतनी सुंदर दिखती है कि एक राजकुमार को उससे प्यार हो जाता है और अंत में वह सिंड्रेला से शादी कर लेता है। इस कहानी में यह दिखाया गया है कि अन्याय सहना औरतों का गुण होता है। सिंड्रेला की सुंदरता उसकी किस्मत बदल देती है। अगर सिंड्रेला सुंदर नहीं होती, तो राजकुमार का दिल उस पर नहीं आता। क्या यह अच्छा नहीं होता कि राजकुमार सिंड्रेला की योग्यता और स्वभाव के कारण उसके प्रति आकर्षित होता? मगर हमारे समाज में आज भी औरतों का सुंदर और विनम्र होना उनके योग्य होने से अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है। क्या हम छोटी बच्चियों को यह सीख देना चाहेंगे कि उनका जीवन किसी राजकुमार या अमीर इंसान से शादी करने के बाद ही सुखमय होगा? ऐसे कई सवाल हैं जिनके जवाब हमें देने होंगे। इन सवालों से बचकर निकल जाना तो बहुत आसान है, लेकिन ऐसा करना आने वाली पीढियों के लिए अच्छा नहीं होगा।
  2. दूसरों की शर्तों पर जीने वाली औरतें: इन कहानियों में औरतों को हमेशा अपने पतियों या पिताओं की आज्ञा का पालन करते हुए दिखाया जाता है। उनका अपना कोई व्यक्तित्व नहीं होता है। वे हर बात को आँख मूंदकर मान लेती हैं। एक कहानी में एक औरत अपने पिता के वचन को निभाने के लिए राक्षस से विवाह करने के लिए तैयार हो जाती है। क्या राक्षस से बचने के लिए किसी औरत का उससे विवाह करा देना ही एकमात्र समाधान है? राक्षसों को मारने की जिम्मेदारी पुरुषों को दी गई है। औरतें तो राक्षस का मन मोहकर ही उससे बच सकती है। ऐसी कहानियाँ पढ़कर ऐसा लगता है कि इनकी कल्पना औरतों ने ही की होगी।" राक्षस" जैसे पति से मुक्ति नहीं मिल पाने के कारण उनकी घुटन ऐसी कहानियों के माध्यम से बाहर निकलती होगी। लेकिन अपने बच्चों को इस तरह की कहानियाँ सुनाकर हम उनके वैचारिक विकास में बाधा उत्पन्न करेंगे।
  3. सुंदरता को सब-कुछ मानने वाली औरतें: ऐसी कई कहानियाँ हैं जिनमें औरतों का जीवन उनकी सुंदरता से बनता या बिगड़ता है। "नन्ही जलपरी" नामक कहानी में नायिका के पास अपने प्रेमी का दिल जीतने के लिए सिर्फ़ उसकी सुंदरता है। कहानी का एक पात्र उससे यह कहता है कि पुरुषों का दिल जीतने के लिए उनसे बात करना नहीं, बल्कि उनकी नज़र में सुंदर दिखना जरूरी है। ऐसी कहानियों से छोटी बच्चियों की मानसिकता पर क्या असर पड़ेगा? क्या औरतों का कोई व्यक्तित्व नहीं होता है? सुंदरता को इतना महत्त्व देने वाली नायिकाओं की कहानी सुनाकर हम बच्चों के दिल में यह बात बैठा देंगे कि जो औरत सुंदर नहीं है, वो जिंदगी में कोई बड़ा काम नहीं कर सकती हैं.

Sunday, June 22, 2008

अपनों द्वारा उपेक्षित हिंदी

हिंदी ऐसी माँ की तरह है जिसके बच्चे उससे प्यार नहीं करते हैं यह एक कड़वा सच है फादर कामिल बुल्के जैसे हिंदी-प्रेमी ने हिंदी बोलने वालों के बारे में कहा था कि वे अपनी भाषा से उतना प्यार नहीं करते हैं जितना प्यार अन्य भाषा बोलने वाले अपनी भाषा से करते हैं अधिकतर हिंदी भाषी ऐसी संतान की तरह होते हैं जो कमाने के लिए घर से निकल कर बाकी पूरी दुनिया को तो अपना लेती है, लेकिन अपने घर की कोई ख़बर नहीं लेती है

जीवन के अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रसंगों में हम अपनी भाषा का प्रयोग नहीं कर सकते हैं। ऐसे प्रसंगों में हम अंग्रेज़ी का प्रयोग करते हैं। अंग्रेज़ी एक सीमा तक हमारी मदद कर सकती है, मगर यह हमारी भावनाओं को अभिव्यक्त करने का अच्छा माध्यम नहीं हो सकती है। इसकी वजह बिल्कुल साफ़ है। भाषा हमारे संस्कारों से जुड़ी होती है। यह हमें अपनी माँ, अपने मोहल्लेवालों, अपने रिश्तेदारों आदि से मिलती है, लेकिन अंग्रेज़ी हमें आस-पड़ोस से नहीं मिलती है। इसे हम स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय आदि में सीखते हैं और सीखने की यह प्रक्रिया अक्सर स्वैच्छिक नहीं होती है। इसके सीखने का सबसे बड़ा कारण यह होता है कि अंग्रेज़ी के बिना हम बाज़ार में अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं करा सकते हैं। अंग्रेज़ी उस आंटी की तरह होती है जो पड़ोसी के बच्चों की आवश्यकताओं को अच्छी तरह नहीं समझ पाती है। वह कभी-कभार उनका ध्यान तो रख सकती है, लेकिन कहीं कोई कमी रह जाती है। मैं अंग्रेज़ी सीखने का विरोध नहीं कर रहा हूँ। मैं उस गुलाम मानसिकता का विरोध कर रहा हूँ जो तथाकथित प्रगति के नाम पर ऐसी हर चीज़ को गले लगाती है जो हमें आगे ले जाने के बदले पीछे ले जाती है। अंग्रेज़ी सीखने के लिए क्या हिंदी की उपेक्षा करना आवश्यक है?

हिंदी बोलने वाले इस संपन्न और मधुर भाषा के प्रति उदासीन क्यों हैं? शायद इसका जवाब हमारे इतिहास में छिपा है। सैकड़ों वर्षों की गुलामी ने हमारी रचनात्मकता और स्वाभिमान पर नकारात्मक असर डाला है। शायद हम भारतीयों को गुलामी की आदत हो गई है। कुछ लोग तो बड़े गर्व से बताते हैं कि उन्हें हिंदी समझने में दिक्कत होती है। ऐसे लोग बचपन से हिंदी के माहौल में पढ़े होते हैं, लेकिन अंग्रेज़ी के अन्धभक्त होने के कारण उन्हें हिंदी का प्रयोग करना अपने "स्टेटस" को कम करने जैसा लगता है। गुलाम मानसिकता के शिकार लोगों से और क्या उम्मीद की जा सकती है?

हिंदी के प्रति उदासीनता के कई प्रमाण हैं। जब यह भाषा अपने लोगों द्वारा उपेक्षित है, तो अन्य लोगों से क्या शिकायत हो सकती है? इस उपेक्षा के कुछ उदाहरण नीचे दिए गए हैं:

  1. अभी हाल में जारी किया गया मोज़िल्ला फायरफॉक्स ३ हिंदी भाषा में उपलब्ध नहीं है। पंजाबी और गुजराती में इसका अनुवाद हो चुका है, लेकिन हिंदी में स्वैच्छिक अनुवादकों की कमी के कारण इसका हिंदी संस्करण उपलब्ध नहीं हो पाया है। क्या इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि हिंदी भाषियों को अपनी भाषा से लगाव नहीं है?
  2. विकिपीडिया में हिंदी में 20287 लेख हैं। हिंदी लगभग 68 करोड़ लोगों की मातृभाषा है। इसकी तुलना में इंडोनीशियाई बोलने वालों की संख्या बहुत कम है। यह लगभग 20 करोड़ लोगों की मातृभाषा है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि विकिपीडिया में इंडोनिशियाई में 84886 लेख हैंमैं अभी जर्मन और इतालवी की बात नहीं कर रहा हूँ। ये विकसित देशों की भाषाएँ हैं। मैंने इंडोनीशियाई का उदाहरण इसलिए दिया है क्योंकि यह हमारे जैसे विकासशील देश में बोली जाती है।
  3. भारत में आने वाले विदेशी नेता अपनी भाषा में बात करते हैं और इस दौरान संवाद स्थापित करने की जिम्मेदारी दुभाषिया की होती है। हमारे नेता अपनी बात अंग्रेज़ी में कहते हैं। क्या उनका आत्मसम्मान इस कदर मर चुका है कि वे अपनी भाषा में बात भी नहीं कर सकते हैं?
  4. हिंदी के अधिकतर समाचारपत्रों और पत्रिकाओं में अस्वाभाविक हिंदी का प्रयोग किया जाता है। इनके अधिकतर पाठ अंग्रेज़ी से अनूदित होते हैं और अनुवाद का स्तर प्रायः संतोषजनक नहीं होता है। ऐसी हिंदी में अंग्रेज़ी के शब्दों का अनावश्यक प्रयोग किया जाता है। हर भाषा अन्य भाषाओँ से प्रभावित होती है, लेकिन हिंदी तो अंग्रेज़ी से आतंकित ही होती आई है। "आतंकित होने" और "प्रभावित होने" में बहुत अंतर है।
ऐसे कई उदाहरण दिए जा सकते हैं जिनसे हिंदी के प्रति उदासीनता के बारे में पता चलता है। सवाल यह है कि क्या हम इस स्थिति में परिवर्तन लाने के लिए व्यक्तिगत स्तर पर प्रयत्न नहीं कर सकते हैं? अगर हम लेख नहीं लिख सकते हैं, तो कम-से-कम अच्छे अनुवाद के माध्यम से इंटरनेट पर हिंदी के पाठों की संख्या में वृद्धि तो कर ही सकते हैं। हिंदी को स्वाभाविक बनाने के लिए ऐसे समाचारपत्रों की आलोचना करनी चाहिए जो हिंदी को अंग्रेज़ी की "गरीब सहेली" के रूप में प्रस्तुत करते हैं। हिंदी को हिंगलिश बनाने की प्रवृत्ति पर रोक लगानी होगी। ऐसा तभी हो सकेगा जब हिंदी का पाठक-वर्ग जागरूक बनेगा। हमें जनविरोधी मीडिया को यह बताना होगा कि हिंदी हमारी राष्ट्रीय भाषा है, "नेशनल लैंग्वेज" नहीं।








Thursday, June 19, 2008

सोने की जंजीर और औरतें

शीर्षक को पहले स्पष्ट कर दूँ। यहाँ सोने की जंजीर का मतलब है "सुख-सुविधा के ऐसे साधन जो बंधन की वजह बन जाते हैं" जे.एन.यू में पढ़ाई करते समय नारीवाद के कई रूपों को करीब से देखने और समझने का मौका मिला। ऐसी कई छात्राओं से मुलाकात हुई जो समाज में अपनी स्थिति से संतुष्ट नहीं हैं। मगर आज मैं एक ऐसी प्रवृत्ति के बारे में लिखना चाहता हूँ जो औरतों को पुरुषवादी सोच से बाहर नहीं निकलने देती है।

मैंने अपने कैंपस में ऐसी छात्राएं देखीं जो आजाद तो होना चाहती हैं, लेकिन उनमें इतनी हिम्मत नहीं है कि वे अपनी आजादी की कीमत चुका सकें। ये तो हम सभी जानते हैं कि अपनी शर्तों पर जीना अक्सर आसान नहीं होता
है। इसकी कीमत चुकानी पड़ती है। मगर क्या अधिकतर लड़कियां ऐसा कर पाती हैं?

औरतों की आजादी के बारे में बात करना एक बात होती है और उस आजादी के रास्ते पर चलना दूसरी। ऐसी छात्राओं के बारे में क्या कहा जा सकता है जो नारीवाद पर दर्जनों पुस्तकें पढने के बाद शादी अपने
परिवार द्वारा खोजे गए लड़के के साथ करती हैं? आश्चर्य की बात तो यह है कि ऐसा करते समय उन्हें दहेज देना भी बुरा नहीं लगता है। क्या ऐसा वो अपने माँ-बाप की खुशी के लिए करती हैं? मगर ऐसी खुशी की परवाह क्यों की जाए जो बर्बादी का कारण बनती है।

मुझे कथनी और करनी के इस अंतर की वजह जानना है। क्या इसके पीछे सुख-सुविधा का मोह होता है? सुरक्षित जीवन अपनी ओर खींचता ज़रूर है लेकिन उसमें "जीने लायक" कुछ बचता ही नहीं है। 4 मोबाइल होने के बावजूद आप अकेलापन महसूस कर सकते हैं। बिस्तर खरीद लेने से अच्छी नींद नहीं जाती है। पति और संपत्ति मिल जाने के बाद औरतों को क्या उस घुटन का अहसास कभी नहीं होता है जो भारत में लगभग हर घर की असलियत है? अपनी मर्जी से वे कहीं -जा नहीं सकती हैं। उनकी अपनी कोई जिंदगी नहीं होती है। वे बस माँ, बहू, भाभी और ननद बन कर रह जाती हैं। उन्हें यह बात कब समझ में आएगी कि जंजीर चाहे सोने की हो या पीतल की, वो जंजीर ही होती है?

किसी विवाहित हिंदू औरत को पहचानना बहुत आसान है क्योंकि वो चूड़ियाँ पहनती हैं या सिंदूर लगाती हैं। लेकिन
क्या किसी विवाहित हिंदू पुरुष को पहचानना संभव होता है? नहीं, बिल्कुल नहीं! औरतों ने विवाह की इन निशानियों को इतना महत्त्व दिया है, मगर क्या ये सवाल उनके दिमाग में कभी नहीं आता है कि पुरुषों को विवाह के बाद ऐसा कुछ क्यों नहीं पहनना पड़ता है जो उनके विवाहित होने का सूचक हो? हाँ, एक चीज़ है जो पुरुषों के विवाहित होने का सूचक है, और वह है उनकी "तोंद"! अक्सर यह सुनने में आता है कि फलाने की शादी हो गई है, अब तो वो मोटा होने ही वाला है। और उसे मोटा बनाएगा कौन? उसकी बीबी! यह सुनकर ऐसा लगता है कि वो बीबी सबसे अच्छी मानी जायेगी जो अपने पति को कम-से-कम समय में मोटा कर दे। अच्छी बीबी कहलाने के लिए अगर यह करना पड़े, तो ऐसी बीबी बनने से तो अच्छा है कि औरत शादी के बगैर अपनी जिंदगी बिताये या किसी ऐसे पुरुष को अपना जीवनसाथी बनाए जो उसे एक इंसान के रूप में देखे, बीबी या अपने बच्चों की माँ के रूप में नहीं।

"सुरक्षा के मोह में ही सबसे पहले मरता है आदमी" - राजकमल चौधरी की यह पंक्ति यहाँ बिल्कुल प्रासंगिक है।अगर औरतों को स्वतंत्र होना है, तो उन्हें सुरक्षा का मोह छोड़ना होगा। हो सकता है कि मैं जिसे सुरक्षा का मोह समझ रहा हूँ, वह उनकी मजबूरी हो। मगर मजबूरी के कारण सारे जीवन को दांव पर लगा देना भी सही नहीं है।शादी को अपनी नियति मानने से औरतों का भला कभी नहीं हो पाएगा। शादी तो समाज की वह दमघोंटू संस्था है जिसमें पत्नी मरते दम तक पति की संपत्ति की "इज्जतदार केयरटेकर" बन कर रह जाती है। और इस सच को छुपाने के लिए दुनिया-भर के पर्व-त्यौहार आदि हैं जो औरतों को इस बात की झूटी तसल्ली देते हैं कि वे परिवार चला रही हैं और घर में उन्हें सबसे अधिक महत्त्व दिया जा रहा है। सच तो यह है कि उन्हें अपने हिसाब से जीने का हक कभी नहीं मिलता है।