रविवार, 28 जुलाई 2013

कुछ तो बात है कि हस्ती नहीं मिटती जेएनयू की

अगर आप यह जानना चाहते हैं कि जेएनयू‬ में ऐसा क्या है जो इसे तमाम दूसरे विश्‍वविद्यालयों से अलग करता है तो कल हुए छात्र प्रदर्शन के बारे में सुनिए। इस विश्‍वविद्यालय के छात्रों को आज जब यह पता चला कि नौसेना में पत्नियों की अदला-बदली की लगभग संस्थागत रूप ले चुकी परंपरा का विरोध करने वाली सुजाता नाम की महिला को दिल्ली पुलिस झूठे मामले में गिरफ़्तार करके लगभग घसीटते हुए वसंत विहार थाने ले गई है तो वे बड़ी संख्या में वहाँ पहुँच गए। उनके पास न तो पोस्टर चिपकाने का समय था न सभा-सम्मेलन करने का। लेकिन इस कैंपस के जुझारू साथी बड़ी संख्या में थाने के बाहर नज़र आ रहे थे। इस भीड़ में देर तक नारा लगाने के बाद थके लेकिन जोश से भरे हुए चेहरों से टपकने वाले पसीने में आने वाले कल की आशा दिख रही थी। प्रगतिशीलता को केवल नौकरी पाने या सत्ता पाने के माध्यम के रूप में देखने वाले लोगों को इस विश्‍वविद्यालय से बहुत कुछ सीखने की ज़रूरत है। सत्ता के हर घृणित कदम पर विरोध का बिगुल बजाने की चेतना ही प्रगतिशीलता कहलाती है। इससे कम में संतुष्ट होने वाली चेतना या तो सत्ता की दलाली की ओर जाती है या अपने सीमित दायरे में खुश रहने की संकुचित भावना की ओर।

आज द हिंदू की छपी खबर से यह मालूम हुआ कि पुलिस ने सुजाता को जिया सराय में उनके किराये के घर से गिरफ़्तार करने के बाद उन्हें चप्पल तक पहनने का समय नहीं दिया और उन्हें रास्ते में लगातार थप्पड़ मारे गए। पुलिस को किसी नागरिक के साथ ऐसा व्यवहार करने का अधिकार किसने दिया? जेएनयू के साथियों का मानना है कि पुलिस गृह मंत्रालय के दबाव में सुजाता के साथ ऐसा व्यवहार कर रही है। दिल्ली में पिछले साल दिसंबर में सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद पूरे देश में आक्रोश का माहौल बन गया था। लेकिन आज उसी दिल्ली में एक महिला के साथ इतना बुरा व्यवहार करने वाले लोगों की आलोचना करने का साहस बहुत कम लोगों में दिखता है। हमारी नैतिकता ऐसे मौकों पर हमेशा कमज़ोर पड़ जाती है जहाँ शोषित या पीड़ित व्यक्ति का समर्थन करने पर पुलिसिया कार्रवाई का डर बना रहता है। ऐसे समय में जेएनयू जैसे विश्‍वविद्यालय का महत्व और बढ़ जाता है जहाँ कमज़ोर की चमड़ी का जूता पहनने की संस्कृति का विरोध करने वाली चेतना अपने मुखरतम रूप में दिखती है। इसी चेतना के कारण छात्र कभी कड़कड़ाती ठंड में बलात्कार की संस्कृति का विरोध करने के लिए सड़क पर प्रदर्शन करते हैं तो कभी अपने ही विश्‍वविद्यालय के प्रशासन की गलत नीतियों का विरोध करते हुए अपना करियर दाँव पर लगा देते हैं। विरोध की इस संस्कृति को लाखों तोपों की सलामी देनी चाहिए।   

शनिवार, 5 जून 2010

हिंदी समुदाय यानी...

शीर्षक में 'यानी' के बाद आप कुछ भी जोड़ सकते/सकती हैं - गुलाम मानसिकता के शिकार लोगों का समूह, पस्त होने के बाद तटस्थ हो जाने वालों का समूह, ऐसा समुदाय जिसके नायक या तो भूख से मरते हैं या उपेक्षा से, ऐसे लोगों का समूह जो अपनी पहचान भूल चुका है...। आशावादियों के शब्द होंगे - ऐसा समुदाय जो तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपने सपनों को ज़िंदा रखता है...।

यह तो हुई आपकी बात। अभी मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि मैं इस समुदाय को किस रूप में देखता हूँ। मैं इस समुदाय को ऐसे कीचड़ के रूप में देखता हूँ जिसमें कमल का खिलना असंभव-सा लगता है। मैं इस बात से इनकार नहीं करता हूँ कि ऐसे हालात भी बन सकते हैं कि अभी असंभव-सा दिखने वाला परिवर्तन भविष्य का यथार्थ बन जाए, लेकिन अभी स्थिति निराशाजनक ही लगती है।

कुछ महीनों पहले मैंने नई दिल्ली में इंडिया हैबिटेट सेंटर में भारत के शिक्षा मंत्री के साथ हिंदी के वरिष्ठ आलोचक और हास्य कवि  को एक मंच पर एक जैसी बातें करते सुना। उनकी बातें सुनकर मेरे मन में यह खयाल आया कि नेता की हाँ में हाँ मिलाने वाले आलोचकों और रचनाकारों को ऐसा क्या मिल जाता है कि वे जनता का विश्वास खोने के लिए तैयार हो जाते हैं। मैंने आलोचक के बारे में बहुत-कुछ सुन रखा था और मैं उस कार्यक्रम में केवल उन्हें सुनने गया था। शिक्षा मंत्री शिक्षा को दुकान का माल बनाना चाहते हैं और उनकी इस मुहिम में उनका साथ देने वाला हर बुद्धिजीवी मेरी नज़र में बौद्धिक बेईमानी कर रहा है। मंत्री जी से मुझे कभी कोई उम्मीद नहीं थी, इसलिए उनकी रटी-रटाई बातें सुनकर मुझे बुरा भी नहीं लगा। लेकिन हिंदी के वरिष्ठ आलोचक...। उन्हें तो प्रगतिशीलता का मानक कहा जाता था (कुछ लोगों को शायद 'था' के बदले 'है' का प्रयोग सही लगेगा)। उन्होंने इस कार्यक्रम में यह क्यों कहा कि मंत्री जी जो कर रहे हैं उसका महत्व आने वाली पीढ़ियाँ समझेंगी? सत्ताधारी वर्ग की हाँ में हाँ मिलाने वाले इस आलोचक को अगर प्रगतिशील कहा जाता है तो हमें प्रगतिशीलता की परिभाषा बदल देनी होगी।

कवि महाशय ने मंत्री जी की इतनी बड़ाई की, इतनी बड़ाई की, इतनी बड़ाई की कि मेरा मुँह खुला का खुला रह गया। अगर हम कवि जी की बात मानें तो भारत के शिक्षा मंत्री दुनिया के सबसे प्रगतिशील मंत्री हैं। यह दूसरी बात है कि इस मंत्री ने अपने देश की ज़मीनी हकीकतों को भूलकर ऐसे कदम उठाए हैं जिनका फ़ायदा केवल सेठों को मिलेगा।

हिंदी समुदाय की बात निकलती है तो हर बात पर रोना आता है। लगभग पचास करोड़ लोगों द्वारा बोली जाने वाली हिंदी में किताब के पहले संस्करण की पाँच सौ प्रतियाँ भी नहीं छप पाती हैं। इस समुदाय में प्रकाशकों की बेटियों की शादी पाँचसितारा होटलों में होती है और लेखक बेटी के पैदा होने की कल्पना करते ही सिहर जाता है। यह सिहरन लेखकों के वैचारिक और भौतिक विपन्नता के कारण पैदा होती है। आज भी अधिकतर लेखक सामंती आदर्शों से अपना पीछा नहीं छुड़ा सके हैं। ये लेखक आज भी नैतिकता के लिए उन सामाजिक और धार्मिक संदर्भों का सहारा लेते हैं जिन्हें सत्ताधारी वर्ग सदियों से भुनाता आया है।

ब्राह्मणवादी व बाज़ारवादी ताकतों ने लंबा-चौड़ा जाल बिछा रखा है। इस बौद्धिक जाल को काटकर प्रगतिशील विमर्श के लिए जगह बनाना आसान नहीं है। अधिकतर पत्र-पत्रिकाओं में रचना से अधिक महत्व रचनाकार को दिया जाता है। संपर्क के बल पर पत्र-पत्रिकाओं में अपनी स्तरहीन रचनाएँ छपवाने में सफल साहित्यकारों ने पूरे हिंदी समुदाय की रचनात्मकता पर सवाल खड़ा कर दिया है।

अगर इस समुदाय को अपनी छवि बदलनी है तो इसे अपनी रचनात्मकता का इस्तेमाल सत्ता के गलियारे में घूमने की सामर्थ्य हासिल करने के बदले जनता की आकांक्षाओं को साकार करने में लगाना चाहिए।

बुधवार, 19 मई 2010

मीडिया और साहित्य की भिड़ंत का नज़ारा

कल 'मीडिया में साहित्य की खत्म होती जगह' विषय पर हुई बहस में मुझे राजेंद्र यादव की यह बात सही लगी कि साहित्य और मीडिया की लड़ाई असल में दो वर्गों की लड़ाई है। मीडिया साधनसंपन्न वर्ग है और साहित्य हमेशा से साधनहीन वर्ग रहा है।

साधनसंपन्न वर्ग के पास साधन क्यों है, इस पर किसी वक्ता ने कुछ नहीं कहा। शायद लोग इस बात पर बहस नहीं करना चाहते हैं। किसी सज्जन ने ई-मेल करके आयोजकों से यह सवाल किया कि माओवादियों के मसले पर साहित्य जगत में भयानक चुप्पी क्यों छाई हुई है। इस सवाल का संतोषजनक जवाब देने के बदले यह कहा गया कि मीडिया में भी इस विषय पर सार्थक बहस नहीं हो रही है। मामला 'परस्परं निंदति, छी: रूपं छी: ध्वनि' का हो गया। इस बहस में मीडियाकर्मियों और साहित्यकारों के तनावपूर्ण संबंध पर भी मेरा ध्यान गया।

जब तक मीडिया पर लालची पूँजीपतियों का कब्ज़ा है तब तक इसमें साहित्य के नाम पर कूड़ा ही परोसा जाएगा। सुधीश पचौरी ने साहित्य के प्रोडक्शन (जिसे मैं हिंदी में उत्पादन लिखता हूँ) की बात की। क्या सृजन के लिए उत्पादन शब्द का प्रयोग करना सही है? उत्पादन की एक तय प्रक्रिया होती है। क्या हम यह बात साहित्य पर भी लागू कर सकते हैं?

सुधीश पचौरी ने कहा कि समय के साथ लिटरेचर (जिसे मैं हिंदी में साहित्य लिखता हूँ) का भी रूप बदला है। उन्होंने कहा कि ब्लॉग भी साहित्य है। हिंदी ब्लॉग के स्तर को देखते हुए मुझे उनकी यह बात तर्कसंगत नहीं लगती है। साहित्य की गरिमा को बनाए रखने की ज़रूरत है।

जनसत्ता के संपादक ओम थानवी ने ब्लॉग में शब्दों की फ़िज़ूलखर्ची का उल्लेख किया। उन्होंने यह भी कहा कि ये माध्यम लोगों को केवल अपने बारे में बताने का संस्कार दे रहे हैं।

मीडियाकर्मी रवीश कुमार ने नए माध्यमों के प्रति साहित्यकारों की उदासीनता के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि उदय प्रकाश को छोड़कर शायद ही कोई कवि ब्लॉग लिखता है।

शीबा असलम फ़हमी ने ब्लॉग, ट्विटर आदि नए माध्यमों का मूल्यांकन करने में जल्दबाज़ी नहीं करने की सलाह दी।

पूरी बहस में पीछे बैठे लोगों के सवालों और चुटकियों ने माहौल को बोझिल नहीं होने दिया। अंत में जब कार्यक्रम का समापन करते समय सुधीश पचौरी की नई किताब के बारे में जानकारी दी गई तो पीछे से एक आवाज़ आई - यही है बाज़ार...

मुझे लगता है कि मीडिया उस साहित्य को जगह नहीं दे सकता है जिसमें उसकी काली करतूतों को उजागर किया गया हो। शोषण और भेदभाव की कहानियों से मीडिया के मालिक चिढ़ते हैं, इसलिए वे ऐसी रचनाओं को प्रकाशित नहीं करते हैं।

कल की बहस का असली मुद्दा यह होना चाहिए था - 'व्यवस्था परिवर्तन में मीडिया और साहित्य की क्या भूमिका हो सकती है और इसमें वे कैसे एक-दूसरे का साथ दे सकते हैं?'

कार्यक्रम में हिंदी की रोटी खाने वाले कुछ लोगों की भाषा पर भी मेरा ध्यान गया। ये लोग शायद अंग्रेज़ी में सोचकर हिंदी में उसका अनुवाद करते हुए बोल रहे थे। भाषा और समझ में बहुत गहरा संबंध होता है। सत्ता की हर बात से सहमत होने वाले लोगों की भाषा उनकी समझ की चुगली कर ही देती है। भारत में सत्ताधारी वर्ग ने अंग्रेज़ी का प्रयोग लोगों पर शासन करने और उनका शोषण करने के उपकरण के रूप में किया है। सत्ता से चिपके रहने वाले कुछ तथाकथित रचनाकार सत्ता की इस भाषा पर सौ जान से फ़िदा नज़र आते हैं।

मंगलवार, 18 मई 2010

राजेश खन्ना पर वृत्तचित्र



एक दौर था जब राजेश खन्ना के नाम पर लोग मर-मिटने को तैयार थे। ज़ाहिर-सी बात है कि इन लोगों में लड़कियों की संख्या अधिक थी। एक बार सिनेमा हॉल में फ़िल्म देखते समय राजेश खन्ना के एक दीवाने पर मेरा ध्यान गया। वह हर दृश्य पर ऐसे झूम रहा था जैसे उसे किसी अलौकिक आनंद की प्राप्ति हो गई हो।

अब यह तो मनोविज्ञान या समाजशास्त्र के जानकार ही बताएँगे कि एक इनसान पूरे देश की धड़कन कैसे बन जाता है। राजेश खन्ना में ऐसी कौन-सी खूबियाँ थीं कि लोग उनके दीवाने हो गए थे?

इस वृत्तचित्र में राजेश खन्ना का आत्मविश्वास देखने लायक है। इस खूबी के साथ उनकी एक कमी भी दिखती है - उनका आत्मकेंद्रित स्वभाव।

भारत में स्टार के नखरों से अनजान विदेशी फ़िल्मकर्मी जब सही समय पर इंटरव्यू लेने पहुँचता है तो उसे यह मालूम हो जाता है कि इस देश में समय का सही या गलत होना स्टार तय करता है। बार-बार कोशिश करने के बाद जब वह इंटरव्यू लेने में कामयाब हो जाता है तो उसे धीरे-धीरे बॉलीवुड के बारे में ऐसी बातें मालूम होती हैं जिनका वह अंदाज़ा भी नहीं लगा सकता था।

हममें से अनेक लोग सत्तर के दशक में इस दुनिया में नहीं थे। ऐसे लोगों के लिए इस वृत्तचित्र का बहुत अधिक महत्व है। उस दौर को हमने केवल लोगों की बातों और किताबों से जाना है, लेकिन वृत्तचित्र देखते समय हम उस दौर को महसूस कर सकते हैं।

इस वृत्तचित्र में हम राजेश खन्ना के आत्मविश्वास को तब डगमगाते हुए देखते हैं जब उनकी फ़िल्में लगातार पिटने लगीं। इसमें हमें फ़िल्मी दुनिया के षड्यंत्रों की झलक भी देखने को मिलती है।

राजेश खन्ना के सभी प्रशंसकों से अनुरोध है कि वे हमें इस अभिनेता के सुनहरे दौर के बारे में कुछ बताएँ।

        

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2010

आज श्रम दिवस है और मैं आर.डी. बर्मन के बारे में बात कर रहा हूँ


आज श्रम दिवस है और इस मौके पर आर.डी. बर्मन को याद करना कुछ लोगों को अटपटा लग सकता है। मैं ऐसे लोगों को पहले उनके एक गाने के बोल पढ़ने को कहूँगा।

"ऐसा क्यों होता है / कोई हँसता है, कोई रोता है / दौलत वालों के हाथों में / हर दिन हम बिकते हैं / बस्ती-बस्ती यही सबकी / तकदीरें लिखते हैं / मेरी-तेरी मेहनत का यूँ / सौदा क्यूँ होता है

मेरा-तेरा खून-पसीना सिक्कों में ढलता है / फिर भी अपने घर में चूल्हा / कम-कम ही जलता है / मेरी-तेरी जान का दुश्मन / पैसा क्यूँ होता है

जाने क्यूँ पैदा होते हैं / जाने क्यूँ मरते हैं / जब तक जीते हैं जीने का / कर्ज़ अदा करते हैं / बेमकसद-बेकार जीना / मरना क्यूँ होता है / कोई हँसता है / कोई रोता है"


लिंक : http://ww.smashits.com/player/flash/flashplayer.cfm?SongIds=50739


ऐसे गाने रेडियो पर शायद ही कभी सुनने को मिलते हैं। श्रम के शोषण से जुड़े मामलों को टीवी और रेडियों दोनों पर अधिक महत्व नहीं दिया जाता है। आज मैं सभी मीडियाकर्मियों से अनुरोध करता हूँ कि वे बर्मन जैसे संगीतकार को केवल 'चुरा लिया है तुमने जो दिल को' जैसे गानों के लिए नहीं याद करें। दूसरे संगीतकारों के बारे में भी मैं यही कहना चाहूँगा। मीडिया में ऐसे गानों पर भी बात होनी चाहिए जिनमें श्रम और इसके शोषण से जुड़ी बातों को सामने लाया गया है।


आज जनसत्ता में जगदीश्वर चतुर्वेदी जी की पोस्ट छपी है जिसमें उन्होंने टीवी पर हड़ताल से जुड़ी खबरों को केवल पूँजीपतियों के दृष्टिकोण से पेश किए जाने की आलोचना की है। इन खबरों में हड़तालियों को प्रगति का विरोधी घोषित किया जाता है और पूँजीपतियों द्वारा किए जा रहे शोषण पर पर्दा डालने की कोशिश की जाती है।

आज हमें मज़दूरों के अधिकारों के लिए शहीद होने वाले व्यक्तियों को याद करना चाहिए। अगर भारत का मध्य वर्ग केवल 'चुरा लिया है तुमने' जैसे गानों पर ही झूमता रहेगा तो उसे खुद को नैतिकता का पुजारी घोषित करने का कोई अधिकार नहीं है। हम जिस संस्कृति की बात करते हैं उसकी नींव में शोषण की इतनी गंदगी दबी पड़ी है कि कोई विवेकशील मनुष्य जीवन भर अपनी नाक के बंद होने का बहाना बना ही नहीं सकता।

रविवार, 4 अप्रैल 2010

तेरी गठरी में लागा प्रशासन, छात्र जाग जरा...

आप सोच रहे होंगे कि इस अजीब शीर्षक में गठरी का क्या मतलब है। यह गठरी भारत और दुनिया भर के उन छात्रों की 'सामूहिक शक्ति' है जिसके बल पर वे सत्ता की दमनकारी नीतियों को बदलने में सफलता पाते आए हैं। इस सामूहिक शक्ति से डरने वाली सत्ता नियम-कायदों के नाम पर छात्रों की आवाज़ दबाने का षड्यंत्र करती है। अभी जेएनयू (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) में भी ऐसी ही एक कोशिश हुई है।

जेएनयू को भारत के उन चुनिंदा विश्वविद्यालयों में गिना जाता है जहाँ छात्र केवल अपने स्वार्थ के लिए नहीं पढ़ते हैं। यहाँ के छात्र मज़दूरों, अल्पसंख्यकों आदि के अधिकारों के लिए संघर्ष करने से कभी पीछे नहीं हटे हैं और उनकी इस प्रगतिशीलता से घबराने वाले सत्ताधारियों की भी कमी नहीं है। हाल में यहाँ के प्रशासन ने एक ऐसे नियम की घोषणा की है जिसका एकमात्र उद्देश्य छात्रों की गतिविधियों पर पाबंदी लगाना है। इस नियम के अनुसार छात्रों को होस्टल में कोई कार्यक्रम आयोजित करने के लिए प्रशासन से एक सप्ताह पहले अनुमति लेनी होगी। छात्रों को यह भी बताना होगा कि कार्यक्रम में कितने लोग शामिल होंगे। यही नहीं, उन्हें प्रशासन को यह भी बताना होगा कि कार्यक्रम में प्रश्नोत्तर सत्र होगा या नहीं। अगर प्रशासन को लगता है कि कार्यक्रम से देश की आंतरिक सुरक्षा, राष्ट्रीय एकता आदि पर गलत असर पड़ सकता है तो वह इसे आयोजित करने की अनुमति नहीं देगा। मान लीजिए, कैंपस में उत्पीड़ित मुस्लिम, आदिवासी या अन्य कोई समूह आकर अपनी बात छात्रों के सामने रखना चाहता है तो प्रशासन इसे अपनी मर्ज़ी से 'अवांछित गतिविधि' घोषित कर सकता है। अगर समाज के दबे-कुचले वर्ग की आवाज़ को दबाने की यह साजिश कामयाब हो जाती है तो यह सचमुच भारत के प्रजातंत्र का काला अध्याय होगा।

जेएनयू में छात्रों ने न केवल 1975 के आपातकाल से लेकर गुजरात के गोधरा कांड का विरोध किया है बल्कि कैंपस में गरीब छात्रों, मज़दूरो, अल्पसंख्यकों आदि के अधिकारों के लिए भी हमेशा संघर्ष किया है और प्रशासन के विरोध और असहयोग के बावजूद सफलता पाई है। समाज के अनेक बुद्धिजीवी इस विश्वविद्यालय से बौद्धिक ऊर्जा पाते हैं और यही बात कुछ लोगों को पच नहीं रही है। प्रशासन ने जो नया नियम बनाया है उसमें यह भी कहा गया है कि कैंपस में उन फ़िल्मों के प्रदर्शन की भी अनुमति नहीं है जिन्हें सेंसर बोर्ड ने प्रमाणपत्र नहीं दिया है। कुछ फ़िल्में ऐसी होती हैं जो सेंसर बोर्ड की नज़र में विवादास्पद हो सकती हैं, लेकिन भारत का बौद्धिक केंद कहे जाने वाले जेएनयू में छात्रों को अव्यावसायिक रूप से ये फ़िल्में दिखाए जाने पर प्रशासन को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। मुझे याद है कि गुजरात में हुए नरसंहार के बाद जब जेएनयू में आनंद पटवर्धन की 'फ़ाइनल सॉल्यूशन' दिखाई गई थी तब इस कैंपस में दंगों पर स्वस्थ बहस हुई थी। जेएनयू में आदिवासियों, मज़दूरों आदि के शोषण पर सैंकड़ों वृत्तचित्र दिखाए गए हैं। शायद प्रशासन यह नहीं समझ पा रहा है कि ऐसे वृत्तचित्रों या फ़िल्मों पर पाबंदी लगाकर समाज का कोई भला नहीं होने वाला है।

सत्तर के दशक में लाखों अमेरिकी छात्रों ने अपने देश की साम्राज्यवादी नीतियों का विरोध करने के लिए हड़ताल की थी। उनके इस विरोध का अमेरिकी सेना पर भी असर पड़ा था और हजा़रों सैनिकों ने वियतनाम युद्ध में भाग लेने से इनकार कर दिया था। 1954 में फ़्रांस और अल्जीरिया में हज़ारों छात्रों ने अल्जीरिया पर फ़्रांस के आक्रमण के विरोध में हड़ताल की थी। उनके इस विरोध ने अल्जीरिया में आज़ादी के संघर्ष को नई ऊर्जा दी। अल्जीरिया की आज़ादी में छात्रों ने बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। छात्रों के विरोध के कारण विश्व के तमाम देशों में सत्ताधारियों को अपनी नीतियाँ बदलनी पड़ी हैं। हमें सत्ता की विकृतियों की आलोचना करने वाले छात्रों की आज़ादी छिनने की हर कोशिश का विरोध करना होगा। अगर हम ऐसा नहीं करेंगे तो हमारा समाज धीरे-धीरे उन तमाम विकृतियों का शिकार हो जाएगा जिनकी हम अभी कल्पना भी नहीं कर सकते हैं।

बुधवार, 10 मार्च 2010

सत्ताधारी वर्ग पेट और भाषा से ऐसे खेलता है

पहले पेट की बात करते हैं। आजकल सरकार मटर की दाल का गुणगान करने में लगी हुई है। अरहर की दाल बहुत महँगी हो गई है और अब तो ऐसा लगता है कि आने वाले दिनों में केवल गंधर्व (सत्ताधारी) ही इस दाल से अपनी सेहत बना सकेंगे। किसानों को गरीबी के कारण आत्महत्या करने को मजबूर करने वाली सरकारों (केवल वर्तमान सरकार को दोष देना ठीक नहीं होगा) ने अब यह साफ़-साफ़ कह दिया है कि हमें मटर की दाल खाना शुरू कर देना चाहिए। सरकार हमें यह बताना चाहती है कि महँगाई के बढ़ने और उदारवादी आर्थिक नीतियों में कोई संबंध नहीं है। अब देखना यह है कि महँगाई पर रोक लगाने में असमर्थ सरकारें आने वाले सालों में हमें क्या-क्या खाने की सलाह देंगी। सत्ताधारी वर्ग को इस बात से कोई मतलब नहीं है कि जनता क्या खाना चाहती है।

सत्ताधारी वर्ग गंधर्वों का जीवन जीता है। इस वर्ग के गंधर्वों को हम जैसे साधारण मनुष्यों से हमेशा यह शिकायत होती है कि हम तिल का ताड़ बनाते रहते हैं। गंधर्वों को लगता है कि किसान भूख या गरीबी के कारण आत्महत्या नहीं करता है। इन गंधर्वों का तलवा चाटने वाले सरकारी अधिकारी और पत्रकार हमें बताते हैं कि आत्महत्या की खबर केवल अफवाह है। इनके अनुसार किसान केवल अपनी पत्नियों के अवैध संबंध या ऐसे अन्य कारणों से आत्महत्या करते हैं जिनका भूख से कोई संबंध नहीं होता है।

अब हम भाषा की बात करते हैं। सत्ताधारी वर्ग की हर नीति को प्रगतिशील बताने वाला मीडिया जनता की भाषाओं को विकृत करने का काम पूरी मुस्तैदी से कर रहा है। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के अधिकतर अखबारों में अनावश्यक रूप से रोमन लिपि और अंग्रेज़ी के प्रयोग से यह बात साबित होती है कि मीडिया के बहुत बड़े वर्ग को सत्ता की गुलामी करने में कोई परेशानी नहीं है। हमें मीडिया यह बताने की कोशिश करता है कि उसकी अधकचरी भाषा का कोई विकल्प मौजूद नहीं है। हिंदी अखबारों में 'स्टूडंट मर्डर केस सॉल्व' जैसी भाषा के प्रयोग से भी यही बात साबित होती है कि हिंदी के बड़े अखबारों को भी अंग्रेज़ी की गुलामी भाने लगी है।
सत्ताधारी वर्ग को ऐसी हर बात से डर लगता है जिससे उसके प्रभुत्व को चुनौती मिलती है। जनता की भाषाओं को विकृत करने की साजिश के पीछे भी यही डर काम करता है। जनता अपनी बात अपनी भाषा में सामने रखती है। उसकी भाषा को विकृत बनाकर उसकी अभिव्यक्ति पर ताला लगा दिया जाता है। भाषा अभिव्यक्ति का साधन होती है और जब साधन को ही अधकचरा बना दिया जाए तब अभिव्यक्ति कैसी होगी यह आप आसानी से समझ सकते हैं। लोग साधन या भाषा के औचित्य पर ही अपनी ऊर्जा बर्बाद कर देते हैं और जो अभिव्यक्ति हालात को समझने और बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती थी उसकी भ्रूण हत्या हो जाती है।

इस तरह हम देखते हैं कि सत्ताधारी वर्ग जनता की शारीरिक और बौद्धिक आवश्यकताओं की पूर्ति करने के बदले उसे दोयम दर्जे के विकल्पों से संतुष्ट रहने की सलाह (ज़रूरत पड़ने पर धमकी) देता है। आप लाख कह लें कि हमें मटर की दाल के बदले अरहर की दाल खानी है या 'स्टूडंट मर्डर केस सॉल्व' के बदले 'छात्र की हत्या का मामला सुलझा' जैसी भाषा का प्रयोग करना है, सत्ताधारी वर्ग वही करेगा जिससे उसकी सत्ता सुरक्षित रहेगी। अब यह हमारे ऊपर हैं कि हम इस वर्ग की हर बात सिर झुकाकर मान लें या अपने विवेक को ज़िदा रखते हुए उसका विरोध करें।