शीर्षक में 'यानी' के बाद आप कुछ भी जोड़ सकते/सकती हैं - गुलाम मानसिकता के शिकार लोगों का समूह, पस्त होने के बाद तटस्थ हो जाने वालों का समूह, ऐसा समुदाय जिसके नायक या तो भूख से मरते हैं या उपेक्षा से, ऐसे लोगों का समूह जो अपनी पहचान भूल चुका है...। आशावादियों के शब्द होंगे - ऐसा समुदाय जो तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपने सपनों को ज़िंदा रखता है...।
यह तो हुई आपकी बात। अभी मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि मैं इस समुदाय को किस रूप में देखता हूँ। मैं इस समुदाय को ऐसे कीचड़ के रूप में देखता हूँ जिसमें कमल का खिलना असंभव-सा लगता है। मैं इस बात से इनकार नहीं करता हूँ कि ऐसे हालात भी बन सकते हैं कि अभी असंभव-सा दिखने वाला परिवर्तन भविष्य का यथार्थ बन जाए, लेकिन अभी स्थिति निराशाजनक ही लगती है।
कुछ महीनों पहले मैंने नई दिल्ली में इंडिया हैबिटेट सेंटर में भारत के शिक्षा मंत्री के साथ हिंदी के वरिष्ठ आलोचक और हास्य कवि को एक मंच पर एक जैसी बातें करते सुना। उनकी बातें सुनकर मेरे मन में यह खयाल आया कि नेता की हाँ में हाँ मिलाने वाले आलोचकों और रचनाकारों को ऐसा क्या मिल जाता है कि वे जनता का विश्वास खोने के लिए तैयार हो जाते हैं। मैंने आलोचक के बारे में बहुत-कुछ सुन रखा था और मैं उस कार्यक्रम में केवल उन्हें सुनने गया था। शिक्षा मंत्री शिक्षा को दुकान का माल बनाना चाहते हैं और उनकी इस मुहिम में उनका साथ देने वाला हर बुद्धिजीवी मेरी नज़र में बौद्धिक बेईमानी कर रहा है। मंत्री जी से मुझे कभी कोई उम्मीद नहीं थी, इसलिए उनकी रटी-रटाई बातें सुनकर मुझे बुरा भी नहीं लगा। लेकिन हिंदी के वरिष्ठ आलोचक...। उन्हें तो प्रगतिशीलता का मानक कहा जाता था (कुछ लोगों को शायद 'था' के बदले 'है' का प्रयोग सही लगेगा)। उन्होंने इस कार्यक्रम में यह क्यों कहा कि मंत्री जी जो कर रहे हैं उसका महत्व आने वाली पीढ़ियाँ समझेंगी? सत्ताधारी वर्ग की हाँ में हाँ मिलाने वाले इस आलोचक को अगर प्रगतिशील कहा जाता है तो हमें प्रगतिशीलता की परिभाषा बदल देनी होगी।
कवि महाशय ने मंत्री जी की इतनी बड़ाई की, इतनी बड़ाई की, इतनी बड़ाई की कि मेरा मुँह खुला का खुला रह गया। अगर हम कवि जी की बात मानें तो भारत के शिक्षा मंत्री दुनिया के सबसे प्रगतिशील मंत्री हैं। यह दूसरी बात है कि इस मंत्री ने अपने देश की ज़मीनी हकीकतों को भूलकर ऐसे कदम उठाए हैं जिनका फ़ायदा केवल सेठों को मिलेगा।
हिंदी समुदाय की बात निकलती है तो हर बात पर रोना आता है। लगभग पचास करोड़ लोगों द्वारा बोली जाने वाली हिंदी में किताब के पहले संस्करण की पाँच सौ प्रतियाँ भी नहीं छप पाती हैं। इस समुदाय में प्रकाशकों की बेटियों की शादी पाँचसितारा होटलों में होती है और लेखक बेटी के पैदा होने की कल्पना करते ही सिहर जाता है। यह सिहरन लेखकों के वैचारिक और भौतिक विपन्नता के कारण पैदा होती है। आज भी अधिकतर लेखक सामंती आदर्शों से अपना पीछा नहीं छुड़ा सके हैं। ये लेखक आज भी नैतिकता के लिए उन सामाजिक और धार्मिक संदर्भों का सहारा लेते हैं जिन्हें सत्ताधारी वर्ग सदियों से भुनाता आया है।
ब्राह्मणवादी व बाज़ारवादी ताकतों ने लंबा-चौड़ा जाल बिछा रखा है। इस बौद्धिक जाल को काटकर प्रगतिशील विमर्श के लिए जगह बनाना आसान नहीं है। अधिकतर पत्र-पत्रिकाओं में रचना से अधिक महत्व रचनाकार को दिया जाता है। संपर्क के बल पर पत्र-पत्रिकाओं में अपनी स्तरहीन रचनाएँ छपवाने में सफल साहित्यकारों ने पूरे हिंदी समुदाय की रचनात्मकता पर सवाल खड़ा कर दिया है।
अगर इस समुदाय को अपनी छवि बदलनी है तो इसे अपनी रचनात्मकता का इस्तेमाल सत्ता के गलियारे में घूमने की सामर्थ्य हासिल करने के बदले जनता की आकांक्षाओं को साकार करने में लगाना चाहिए।
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36 मिनट पहले









