बुधवार, ७ अक्तूबर २००९

क्या सचमुच हमारे मस्तिष्क में लाखों वर्षों की सूचनाएँ संचित हैं?

अगर मैं आपसे यह कहूँ कि दुनिया के हर व्यक्‍ति की मानसिक उम्र दो या तीन लाख वर्ष या शायद इससे अधिक है तो शायद आप मुझे मूर्ख समझेंगे। लेकिन जब आपको यह पता चलेगा कि यह बात बीसवीं सदी के महानतम मनौवैज्ञानिकों में से एक कार्ल गुस्ताव जुंग के मुँह से निकली थी तो शायद आप इस बात पर गंभीरतापूर्वक विचार करेंगे। कार्ल गुस्ताव जुंग (1875-1961) ने यह बात अपने सामूहिक अवचेतन सिद्धांत में संदर्भ में कही थी। इस सिद्धांत के अनुसार हर व्यक्‍ति के मस्तिष्क में मानव जाति के आदि काल से लेकर अभी तक के तमाम अनुभव संचित होते हैं। 

जुंग ने इस सिद्धांत की सत्यता के लिए अपने कुछ व्यक्‍तिगत अनुभवों को प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया था। जुंग ने बचपन में एक गुड्डा बनाया था। कई दशकों के बाद उन्होंने अपने एक शोध के दौरान किसी  जनजाति के भगवान औऱ उस गुड्डे की शक्ल में आश्‍चर्यजनक समानता देखी। इस घटना की व्याख्या वह इस तरह करते थे कि उनका अवचेतन उस शक्ल से अपरिचित नहीं था और इसलिए उनसे गुड्डे की वह शक्ल बन गई। कुछ शंकालु यह भी कह सकते हैं कि जुंग ने वह शक्ल किसी किताब में देखी होगी। लेकिन जुंग ने इस संभावना को पूरे आत्मविश्‍वास के साथ नकार दिया था। सामूहित अवचेतन सिद्धांत के अनुसार हमारे अवचेतन में उन देशों से संबंधित जानकारी भी संचित है जहाँ हम कभी नहीं गए। यह जानकारी हमें विरासत में मिलती है, मगर इसे अवचेतन की गुफा से निकलना लगभग असंभव है। 

कितना अच्छा होता अगर हम अपने अवचेतन से अपने काम की बात याद कर सकते। अगर ऐसा करना संभव होता तो हमारे लिए बहुत-से काम आसान हो जाते। उदाहरण के लिए, हमें इतालवी सीखने के लिए बहुत मेहनत नहीं करनी पड़ती। हमें बस अपने अवचेतन मस्तिष्क के इस भाग को जागृत करना होता जहाँ इतालवी से संबंधित जानकारी और अनुभव संचित हैं। लेकिन ऐसा सोचना अभी दूर की कौड़ी है। अवचेतन तो अवचेतन होता है। यह हमारी चेतना की पहुँच से दूर होता है। यह अपनी मर्जी से हमारी चेतना में प्रवेश करता है और अपनी मर्जी से गायब हो जाता है।                       


शुक्रवार, २ अक्तूबर २००९

गूगल पर जानकारी प्राप्त करने के कुछ आसान तरीके

आज गूगल इतना महत्वपूर्ण हो गया है कि इसके बिना इंटरनेट की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। इस वेबसाइट के माध्यम से हर तरह की जानकारी मिलती है। आप गूगल पर जानकारी प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित तरीकों का इस्तेमाल कर सकते हैं :

1. पदबंध या अनेक शब्दों वाली खोज के लिए उद्धरण चिह्नों ("  ") का प्रयोग करें

कई बार हम ऐसी जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं जिसमें एक से अधिक शब्दों का प्रयोग होता है। उदाहरण के लिए, अगर आप गूगल पर तुलसी की उपयोगिता से संबंधित जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं तो आपको 1,910 वेब पेजों में से अपने काम की जानकारी खोजनी होगी। लेकिन "तुलसी की उपयोगिता" पदबंध को उद्धरण चिह्न में रखने से चार सटीक परिणाम प्रदर्शित होंगे। इससे आपका समय बचेगा। 

2. परिभाषा खोजने के लिए define:शब्द टाइप करें

गूगल पर किसी शब्द की परिभाषा खोजने के लिए define: के बाद वह शब्द टाइप करें। इससे छात्रों, शिक्षकों, अनुवादकों आदि को बहुत मदद मिलती है। इंटरनेट पर उपलब्ध अनेक स्रोतों से प्राप्त परिभाषाओं के एक जगह प्रदर्शित होने से हमारा समय भी बचता है। उदाहरण के लिए, biotechnology की परिभाषा खोजने पर (define:biotechnology) हमें निम्नलिखित परिभाषाएँ मिलती हैं :

"biotechnology की अंग्रेज़ी में वेब पर परिभाषा:
3. अज्ञात शब्द या पदबंध की जानकारी प्राप्त करने के लिए * का प्रयोग करें

अगर आप गूगल पर लोकमान्य तिलक का प्रसिद्ध कथन "स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है" खोज रहे हैं और आपको 'जन्मसिद्ध' शब्द याद नहीं आ रहा है तो यह टाइप करें :

"स्वतंत्रता हमारा  * अधिकार है" 

ऐसी खोज में उद्धरण चिह्न का प्रयोग आवश्यक है।

4. मुद्रा परिवर्तित करें

आप गूगल पर संसार की किसी मुद्रा को अन्य मुद्रा में आसानी से परिवर्तित कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, अगर आप 100 यूरो को रुपयों में बदलना चाहते हैं तो गूगल पर 100 euro in Indian rupees टाइप करें। इसी तरह, 100 अमेरिकी डॉलरों को यूरो में बदलने के लिए 100 US dollars in euros टाइप करना होगा।  

5. खोज को किसी विशेष वेबसाइट तक सीमित करें  

कई बार हम किसी विशेष वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं। ऐसा करने के लिए आपको खोज से संबंधित शब्द इस प्रकार टाइप करने होंगे :

खोज से संबंधित शब्द site:वेबसाइट का पता 

उदाहरण के लिए, किसी पत्रकार को बीबीसी की हिंदी वेबसाइट पर लता मंगेशकर से संबंधित किसी आलेख की आवश्यकता हो सकती है। उसे गूगल पर वांछित जानकारी प्राप्त करने के लिए निम्नलिखित शब्द टाइप करने होंगे : 

लता मंगेशकर site:www.bbc.co.uk/hindi  

 





सोमवार, ३० मार्च २००९

जब रामू काका है तो मेहनत क्यों?

कुछ दिन पहले एक विज्ञापन में किसी को यह कहते सुना : "जब रामू काका है तो मेहनत क्यों? जब सॉरी है तो ..." मेरे दिमाग में यह बात आई कि इस विज्ञापन के आधार पर हर उस व्यक्ति को मेहनत नहीं करनी चाहिए जिसके घर में कोई 'रामू काका' है। ऐसे विज्ञापनों से समाज को कैसा संदेश दिया जा रहा है? क्या मेहनत करना सिर्फ़ 'रामू काका' का काम है? क्या बाकी लोगों को सॉरी, थैंक्यू कहते हुए ही अपनी ज़िंदगी काटनी चाहिए?

दरअसल, इस स्थिति के लिए हमारा समाज जिम्मेदार है। कोई ऐसे विज्ञापनों पर सवाल नहीं उठाता है।

पहले रेडियो पर गानों के कार्यक्रम में दो-चार विज्ञापन आते थे। अब स्थिति यह हो गई है कि विज्ञापनों के बीच एक-दो गाने सुनने को मिल जाते हैं। विज्ञापनों का स्तर बहुत गिर गया है।

बुधवार, २५ मार्च २००९

प्राइवेट स्कूलों का नरक

प्राइवेट स्कूल का मेरा अनुभव इतना खराब है कि मैं तो पूरे देश में शिक्षा की इन दुकानों को बंद करवाना चाहूँगा।अंग्रेज़ी और सत्ता के घालमेल से उपजी इन दुकानों की घृणित हरकतों का अंदाज़ा तो इन खबरों से ही लग जाता है:

http://khabar.josh18.com/news/10369/3

http://khabar.ndtv.com/2009/02/28134202/Delhi-school-280209.html

इन स्कूलों में पढ़ाई के स्तर की सच्चाई तो मैं एक छात्र के रूप में भी जान चुका हूँ। जब एक शिक्षक पर दो सौ लड़कों की जिम्मेदारी होती है, तो हर छात्र खुद को उपेक्षित महसूस करता है। सीबीएससी की मान्यता के नाम पर ये स्कूल लाखों-करोड़ों कमा रहे हैं, लेकिन छात्रों के हितों से इनका कोई लेना-देना नहीं होता है।

पटना के एक प्राइवेट स्कूल में बड़े अरमानों के साथ दाख़िला लेने के बाद बहुत जल्दी मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया। इस स्कूल में छोटे कमरे में 50-60 छात्रों को पढ़ाया जाता था। हर क्लास में 4-5 सेक्शन होते थे। टीचरों को बच्चों की पढ़ाई से कोई लेना-देना नहीं था। वे क्लास में आते, यंत्रवत् पढ़ाते और किसी के कुछ पूछने पर डाँटने, खीझने आदि का हथकंडा अपनाकर प्रश्न को टालने की कोशिश करते।

इस स्कूल को सीबीएससी की मान्यता कैसे मिली थी, यह आज भी मेरे लिए एक बहुत बड़ा रहस्य है! आज ऐसे स्कूल हर शहर में खुल गए हैं। इन स्कूलों में छात्रों और उनके माता-पिताओं का हर तरह से शोषण किया जाता है।पैसे कमाने के लिए ये 5 रू. की कॉपी को 50 रू. में बेचने से लेकर हर साल बेतहाशा फ़ीस बढ़ाने तक कोई भी हथकंडा अपना सकते हैं।

जिस स्कूल में मैं पढ़ा था, उसके होस्टल में ककड़ वाली ऐसी दाल मिलती थी जो शायद जेल की दाल से भी बदतर थी। लड़कों को एक बड़े हॉल में सोना पड़ता था। हर जगह गंदगी रहती थी और स्कूल वालों को सिर्फ़ पैसों से मतलब रहता था।

वैसे यह एक बहुत बड़ा सच है कि जो समाज शिक्षा, भाषा आदि विषयों के संदर्भ में जागृत नहीं है, उसमें बच्चों को इस नरक से गुजरना ही पड़ेगा।

गुरुवार, ३ जुलाई २००८

अरे, तुम तो अपनी जाति के निकले!

जे.एन.यू. के बारे में सुना था कि यहाँ लोग कुछ अलग तरह से सोचते हैं। यह जानकर अच्छा लगा था कि मैं ऐसी जगह आ गया हूँ जहाँ आधुनिक व मानवतावादी मूल्यों को महत्त्व दिया जाता है। मगर मेरी यह धारणा गलत निकली। यहाँ के अधिकतर छात्र जाति और धर्म के आधार पर बँटे हुए हैं। यह जातिवाद होस्टल के मेस में भी दिखता है। कम-से-कम मेरे होस्टल में तो ऐसा ही था। ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार वगैरह एक साथ बैठकर खाते थे। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्र दूसरी जगह बैठते। मुसलमानों के बैठने की जगह दूसरी थी। यह विभाजन सबको स्वाभाविक लगता ! किसी ने यह नहीं पूछा कि लड़के अपने सेंटर या स्कूल के साथियों के साथ क्यों नहीं बैठते हैं!

यहाँ के चुनाव में जाति और धर्म बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। चीन, अमेरिका आदि की बात करते हुए सबकी नज़र वोट पर ही रहती है। अनेक छात्र वोट देते समय आपसी फायदे को राजनीतिक विचारधारा से अधिक महत्त्व देते हैंवोट की इस राजनीति में झूट, दबाव और चापलूसी की मदद से काम निकालने में कोई किसी से पीछे नहीं होता है

कैंपस में जातिगत टिप्पणी करने वालों की कमी नहीं हैयहाँ मारपीट की ऐसी कई घटनाएँ हुईं हैं जिनमें जाति के नाम पर गाली-गलौज की गईकुछ लोग यह कहते हैं कि भारत में अब जातिवाद का अस्तित्व नहीं के बराबर हैऐसा कहने वालों को जे.एन.यू. आकर यह अच्छी तरह मालूम हो जाएगा कि भारत में जातिवाद का जहर किस हद तक फैल चुका है

पहले मैंने सिर्फ़ यह सुना था कि एक जाति-विशेष के अधिकतर छात्र हर होस्टल में अपनी जाति के छात्र से परिचित होते हैं। बाद में जब मैंने ख़ुद अपनी आंखों से यह सब देखा तब मुझे जाति के इस अद्भुत भाईचारे को देखकर बहुत आश्चर्य हुआ। यही भाईचारा अगर जाति के आधार पर नहीं होकर केवल छात्र होने के नाते होता, तो हमारा देश आज कितना आगे होता!

मैंने यह भी महसूस किया कि दलित उद्धार के नाम पर कई छात्र जातिवाद को और अधिक बढ़ावा देते हैं। ये लोग अलग-थलग रहकर जातिवाद की जड़ों को मजबूत बनाते हैं। क्या जाति की अवधारणा को पूरी तरह नकारकर इस जहर को समाज से बाहर निकाल फेंकने के बदले अपनी जाति को स्वीकार करते हुए वोट की राजनीति करना सही है? क्या इनके लिए यह कहना असंभव है कि हम किसी जाति-वाति में यकीन नहीं करते। ये लोग ऐसा कहने के बदले यह कहते हैं कि हमारी यह जाति है और हम इस जाति के स्वाभिमान की रक्षा करते हुए किसी सीमा तक जा सकते हैं। क्या ऐसा करते हुए ये लोग जातिवाद की अवधारणा को अपना अप्रत्यक्ष समर्थन नहीं देते हैं?


सोमवार, ३० जून २००८

इंग्लैंड में महिला बिशपों की नियुक्ति का विरोध

यह ख़बर इक्कीसवीं सदी की है! इंग्लैंड के चर्च का एक पादरी-वर्ग चर्च में महिला बिशपों की नियुक्ति के लिए कानून बनाने का विरोध कर रहा है। जब इंग्लैंड जैसे विकसित देश में ऐसा हो सकता है, तो अन्य पिछड़े देशों के बारे में क्या कहा जाए?

विरोध कर रहे पादरी-वर्ग का यह कहना है कि अगर महिला बिशपों की नियुक्ति का कानून बना तो वे चर्च से किसी तरह का संबंध नहीं रखेंगे। विरोध-पत्र पर १३०० से अधिक पादरियों ने हस्ताक्षर किए हैं। उन्होंने इस कानून को एक शर्त पर अपना समर्थन देने की बात की है। इस शर्त के तहत वह चर्च में पुरुषों के लिए अलग उपासना कक्ष की मांग कर रहे हैं।

संसार के किसी धर्म में महिलाओं को बराबरी का दर्जा नहीं दिया गया है। हर धर्म में उसे पुरुषों से कमतर बताया गया है और समाज आज भी धर्म की आड़ में महिलाओं का शोषण कर रहा है। महिला बिशपों की नियुक्ति से आम महिला पर कोई सकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ने वाला है, लेकिन इसके विरोध के पीछे छिपी पुरुषवादी सोच की जितनी निंदा की जाए वो कम है।

सबसे दुःख की बात तो यह है कि सदियों से जिन धर्मों ने महिलाओं का शोषण किया है, उन्हें आगे बढ़ाने में महिलाओं की अच्छी-खासी भूमिका रही है। सदियों की गुलामी के कारण अधिकांश महिलाओं को अपने जीवन की असलियत को जानने का मौका भी नहीं मिल पाता है। वे अपने आँगन की सीमा को लांघकर बाहर के संसार को समझने का प्रयत्न भी नहीं कर पाती हैं। बचपन से ही उन्हें "आदर्श नारी" बनने का घरेलू प्रशिक्षण दिया जाता है। किसी बच्ची के सामने एक झूट को सौ बार कहने से बच्ची उसे सच मान लेती है और इसका परिणाम यह होता है कि बड़ी होने पर वे उन्हीं बातों को बढ़ावा देने लगती हैं जो उनकी गुलामी सुनिश्चित करती हैं।

क्या महिला बिशपों को उस व्यवस्था में घुटन का अहसास नहीं होता होगा जहाँ उनके साथ इतना भेदभाव होता है? इसका उत्तर तो वे ही दे सकती हैं, मगर मैं तो बस इतना कहना चाहूँगा जब तक महिलाएं धर्म की राजनीति को नहीं समझ पाएंगी, तब तक "पवित्र" जंजीरें उन्हें सार्थक जीवन से वंचित करती रहेंगीं।


गुरुवार, २६ जून २००८

औरतों के "औरतीकरण" में कहानियों का योगदान

क्या आपने कभी यह सोचा है कि बचपन में दादी-नानी से सुनी गई कहानियाँ छोटे बच्चों के मन पर नकारात्मक प्रभाव भी डाल सकती हैं? ये कहानियाँ कल्पना की उड़ान-मात्र नहीं हैं।

मैं यहाँ सिर्फ़ भारत के प्रसंग में बात नहीं कर रहा हूँ। इन कहानियों में पूरी मानवता का सच छिपा होता है। इन कहानियों की दुनिया अविश्वसनीय लगती है, लेकिन इनमें जीवन का यथार्थ अपने बदले हुए रूप में होता है।

इन कहानियों में औरतों और लड़कियों के वर्णन पर गौर करने से बहुत-सी बातें सामने आती हैं। हमारे समाज में औरतों से यह अपेक्षा रखी जाती है कि वे आज्ञाकारिता, सेवा, विनम्रता आदि गुणों को अपने जीवन में सबसे अधिक महत्त्व दें। पुरुषों से कार्यकुशल, साहसी, समझदार आदि होने की अपेक्षा रखी जाती है। बच्चों को सुनाई जाने वाली कहानियों में औरतों को उसी रूप में प्रस्तुत किया जाता है जिसे समाज अपने लिए सुविधाजनक मानता है। सिमोन दी बोउआ ने कहा था कि औरतें पैदा नहीं होती, बल्कि बना दी जाती हैं । अगर आप कम उम्र की लड़की को ऐसी कहानियाँ सुनाएंगे जिसमें औरतों की आज्ञाकारिता और पुरुषों की कार्यकुशलता का वर्णन हो, तो आप उसे ऐसी औरत बनाने में पूरी तरह तरह सफल हो जाएंगे जिसे समाज "आदर्श बहू", "आदर्श बेटी" आदि कहकर बुलाएगा। यह औरत अपने व्यक्तित्व को पूरी तरह अपने परिवार में विलीन कर देगी। बच्चों की कहानियों में औरतों के वर्णन पर नीचे विचार किया गया है:

  1. अन्याय सहने वाली औरत: सिंड्रेला जैसी कहानियो में औरतों को बिल्कुल कमजोर दिखाया गया है। अपनी सौतेली माँ और बहनों की डांट-फटकार सुनने के बाद भी सिंड्रेला कुछ नहीं कहती है। वह चुपचाप अपने काम में लगी रहती है। अपनी परिस्थिति में बदलाव लाने के लिए वह कोई प्रयत्न नहीं करती है। उसके जीवन में सकारात्मक बदलाव तब आता है जब जादुई शक्ति से उसके कपड़े राजकुमारी जैसे हो जाते हैं। उन कपड़ों में वह इतनी सुंदर दिखती है कि एक राजकुमार को उससे प्यार हो जाता है और अंत में वह सिंड्रेला से शादी कर लेता है। इस कहानी में यह दिखाया गया है कि अन्याय सहना औरतों का गुण होता है। सिंड्रेला की सुंदरता उसकी किस्मत बदल देती है। अगर सिंड्रेला सुंदर नहीं होती, तो राजकुमार का दिल उस पर नहीं आता। क्या यह अच्छा नहीं होता कि राजकुमार सिंड्रेला की योग्यता और स्वभाव के कारण उसके प्रति आकर्षित होता? मगर हमारे समाज में आज भी औरतों का सुंदर और विनम्र होना उनके योग्य होने से अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है। क्या हम छोटी बच्चियों को यह सीख देना चाहेंगे कि उनका जीवन किसी राजकुमार या अमीर इंसान से शादी करने के बाद ही सुखमय होगा? ऐसे कई सवाल हैं जिनके जवाब हमें देने होंगे। इन सवालों से बचकर निकल जाना तो बहुत आसान है, लेकिन ऐसा करना आने वाली पीढियों के लिए अच्छा नहीं होगा।
  2. दूसरों की शर्तों पर जीने वाली औरतें: इन कहानियों में औरतों को हमेशा अपने पतियों या पिताओं की आज्ञा का पालन करते हुए दिखाया जाता है। उनका अपना कोई व्यक्तित्व नहीं होता है। वे हर बात को आँख मूंदकर मान लेती हैं। एक कहानी में एक औरत अपने पिता के वचन को निभाने के लिए राक्षस से विवाह करने के लिए तैयार हो जाती है। क्या राक्षस से बचने के लिए किसी औरत का उससे विवाह करा देना ही एकमात्र समाधान है? राक्षसों को मारने की जिम्मेदारी पुरुषों को दी गई है। औरतें तो राक्षस का मन मोहकर ही उससे बच सकती है। ऐसी कहानियाँ पढ़कर ऐसा लगता है कि इनकी कल्पना औरतों ने ही की होगी।" राक्षस" जैसे पति से मुक्ति नहीं मिल पाने के कारण उनकी घुटन ऐसी कहानियों के माध्यम से बाहर निकलती होगी। लेकिन अपने बच्चों को इस तरह की कहानियाँ सुनाकर हम उनके वैचारिक विकास में बाधा उत्पन्न करेंगे।
  3. सुंदरता को सब-कुछ मानने वाली औरतें: ऐसी कई कहानियाँ हैं जिनमें औरतों का जीवन उनकी सुंदरता से बनता या बिगड़ता है। "नन्ही जलपरी" नामक कहानी में नायिका के पास अपने प्रेमी का दिल जीतने के लिए सिर्फ़ उसकी सुंदरता है। कहानी का एक पात्र उससे यह कहता है कि पुरुषों का दिल जीतने के लिए उनसे बात करना नहीं, बल्कि उनकी नज़र में सुंदर दिखना जरूरी है। ऐसी कहानियों से छोटी बच्चियों की मानसिकता पर क्या असर पड़ेगा? क्या औरतों का कोई व्यक्तित्व नहीं होता है? सुंदरता को इतना महत्त्व देने वाली नायिकाओं की कहानी सुनाकर हम बच्चों के दिल में यह बात बैठा देंगे कि जो औरत सुंदर नहीं है, वो जिंदगी में कोई बड़ा काम नहीं कर सकती हैं.