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कुछ तो बात है कि हस्ती नहीं मिटती जेएनयू की

अगर आप यह जानना चाहते हैं कि जेएनयू‬ में ऐसा क्या है जो इसे तमाम दूसरे विश्‍वविद्यालयों से अलग करता है तो कल हुए छात्र प्रदर्शन के बारे में सुनिए। इस विश्‍वविद्यालय के छात्रों को आज जब यह पता चला कि नौसेना में पत्नियों की अदला-बदली की लगभग संस्थागत रूप ले चुकी परंपरा का विरोध करने वाली सुजाता नाम की महिला को दिल्ली पुलिस झूठे मामले में गिरफ़्तार करके लगभग घसीटते हुए वसंत विहार थाने ले गई है तो वे बड़ी संख्या में वहाँ पहुँच गए। उनके पास न तो पोस्टर चिपकाने का समय था न सभा-सम्मेलन करने का। लेकिन इस कैंपस के जुझारू साथी बड़ी संख्या में थाने के बाहर नज़र आ रहे थे। इस भीड़ में देर तक नारा लगाने के बाद थके लेकिन जोश से भरे हुए चेहरों से टपकने वाले पसीने में आने वाले कल की आशा दिख रही थी। प्रगतिशीलता को केवल नौकरी पाने या सत्ता पाने के माध्यम के रूप में देखने वाले लोगों को इस विश्‍वविद्यालय से बहुत कुछ सीखने की ज़रूरत है। सत्ता के हर घृणित कदम पर विरोध का बिगुल बजाने की चेतना ही प्रगतिशीलता कहलाती है। इससे कम में संतुष्ट होने वाली चेतना या तो सत्ता की दलाली की ओर जाती है या अपने सीमित दायरे

हिंदी समुदाय यानी...

शीर्षक में 'यानी' के बाद आप कुछ भी जोड़ सकते/सकती हैं - गुलाम मानसिकता के शिकार लोगों का समूह, पस्त होने के बाद तटस्थ हो जाने वालों का समूह, ऐसा समुदाय जिसके नायक या तो भूख से मरते हैं या उपेक्षा से, ऐसे लोगों का समूह जो अपनी पहचान भूल चुका है...। आशावादियों के शब्द होंगे - ऐसा समुदाय जो तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपने सपनों को ज़िंदा रखता है...। यह तो हुई आपकी बात। अभी मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि मैं इस समुदाय को किस रूप में देखता हूँ। मैं इस समुदाय को ऐसे कीचड़ के रूप में देखता हूँ जिसमें कमल का खिलना असंभव-सा लगता है। मैं इस बात से इनकार नहीं करता हूँ कि ऐसे हालात भी बन सकते हैं कि अभी असंभव-सा दिखने वाला परिवर्तन भविष्य का यथार्थ बन जाए, लेकिन अभी स्थिति निराशाजनक ही लगती है। कुछ महीनों पहले मैंने नई दिल्ली में इंडिया हैबिटेट सेंटर में भारत के शिक्षा मंत्री के साथ हिंदी के वरिष्ठ आलोचक और हास्य कवि  को एक मंच पर एक जैसी बातें करते सुना। उनकी बातें सुनकर मेरे मन में यह खयाल आया कि नेता की हाँ में हाँ मिलाने वाले आलोचकों और रचनाकारों को ऐसा क्या मिल जाता है कि

मीडिया और साहित्य की भिड़ंत का नज़ारा

कल 'मीडिया में साहित्य की खत्म होती जगह' विषय पर हुई बहस में मुझे राजेंद्र यादव की यह बात सही लगी कि साहित्य और मीडिया की लड़ाई असल में दो वर्गों की लड़ाई है। मीडिया साधनसंपन्न वर्ग है और साहित्य हमेशा से साधनहीन वर्ग रहा है। साधनसंपन्न वर्ग के पास साधन क्यों है, इस पर किसी वक्ता ने कुछ नहीं कहा। शायद लोग इस बात पर बहस नहीं करना चाहते हैं। किसी सज्जन ने ई-मेल करके आयोजकों से यह सवाल किया कि माओवादियों के मसले पर साहित्य जगत में भयानक चुप्पी क्यों छाई हुई है। इस सवाल का संतोषजनक जवाब देने के बदले यह कहा गया कि मीडिया में भी इस विषय पर सार्थक बहस नहीं हो रही है। मामला 'परस्परं निंदति, छी: रूपं छी: ध्वनि' का हो गया। इस बहस में मीडियाकर्मियों और साहित्यकारों के तनावपूर्ण संबंध पर भी मेरा ध्यान गया। जब तक मीडिया पर लालची पूँजीपतियों का कब्ज़ा है तब तक इसमें साहित्य के नाम पर कूड़ा ही परोसा जाएगा। सुधीश पचौरी ने साहित्य के प्रोडक्शन (जिसे मैं हिंदी में उत्पादन लिखता हूँ) की बात की। क्या सृजन के लिए उत्पादन शब्द का प्रयोग करना सही है? उत्पादन की एक तय प्रक्रिया होती है। क

राजेश खन्ना पर वृत्तचित्र

एक दौर था जब राजेश खन्ना के नाम पर लोग मर-मिटने को तैयार थे। ज़ाहिर-सी बात है कि इन लोगों में लड़कियों की संख्या अधिक थी। एक बार सिनेमा हॉल में फ़िल्म देखते समय राजेश खन्ना के एक दीवाने पर मेरा ध्यान गया। वह हर दृश्य पर ऐसे झूम रहा था जैसे उसे किसी अलौकिक आनंद की प्राप्ति हो गई हो। अब यह तो मनोविज्ञान या समाजशास्त्र के जानकार ही बताएँगे कि एक इनसान पूरे देश की धड़कन कैसे बन जाता है। राजेश खन्ना में ऐसी कौन-सी खूबियाँ थीं कि लोग उनके दीवाने हो गए थे? इस वृत्तचित्र में राजेश खन्ना का आत्मविश्वास देखने लायक है। इस खूबी के साथ उनकी एक कमी भी दिखती है - उनका आत्मकेंद्रित स्वभाव। भारत में स्टार के नखरों से अनजान विदेशी फ़िल्मकर्मी जब सही समय पर इंटरव्यू लेने पहुँचता है तो उसे यह मालूम हो जाता है कि इस देश में समय का सही या गलत होना स्टार तय करता है। बार-बार कोशिश करने के बाद जब वह इंटरव्यू लेने में कामयाब हो जाता है तो उसे धीरे-धीरे बॉलीवुड के बारे में ऐसी बातें मालूम होती हैं जिनका वह अंदाज़ा भी नहीं लगा सकता था। हममें से अनेक लोग सत्तर के दशक में इस दुनिया में नहीं थे। ऐसे लोगों

आज श्रम दिवस है और मैं आर.डी. बर्मन के बारे में बात कर रहा हूँ

आज श्रम दिवस है और इस मौके पर आर.डी. बर्मन को याद करना कुछ लोगों को अटपटा लग सकता है। मैं ऐसे लोगों को पहले उनके एक गाने के बोल पढ़ने को कहूँगा। "ऐसा क्यों होता है / कोई हँसता है, कोई रोता है / दौलत वालों के हाथों में / हर दिन हम बिकते हैं / बस्ती-बस्ती यही सबकी / तकदीरें लिखते हैं / मेरी-तेरी मेहनत का यूँ / सौदा क्यूँ होता है मेरा-तेरा खून-पसीना सिक्कों में ढलता है / फिर भी अपने घर में चूल्हा / कम-कम ही जलता है / मेरी-तेरी जान का दुश्मन / पैसा क्यूँ होता है जाने क्यूँ पैदा होते हैं / जाने क्यूँ मरते हैं / जब तक जीते हैं जीने का / कर्ज़ अदा करते हैं / बेमकसद-बेकार जीना / मरना क्यूँ होता है / कोई हँसता है / कोई रोता है" लिंक : http://ww.smashits.com/player/flash/flashplayer.cfm?SongIds=50739 ऐसे गाने रेडियो पर शायद ही कभी सुनने को मिलते हैं। श्रम के शोषण से जुड़े मामलों को टीवी और रेडियों दोनों पर अधिक महत्व नहीं दिया जाता है। आज मैं सभी मीडियाकर्मियों से अनुरोध करता हूँ कि वे बर्मन जैसे संगीतकार को केवल 'चुरा लिया है तुमने जो दिल को' जैसे गानों के लिए नही

तेरी गठरी में लागा प्रशासन, छात्र जाग जरा...

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आप सोच रहे होंगे कि इस अजीब शीर्षक में गठरी का क्या मतलब है। यह गठरी भारत और दुनिया भर के उन छात्रों की 'सामूहिक शक्ति' है जिसके बल पर वे सत्ता की दमनकारी नीतियों को बदलने में सफलता पाते आए हैं। इस सामूहिक शक्ति से डरने वाली सत्ता नियम-कायदों के नाम पर छात्रों की आवाज़ दबाने का षड्यंत्र करती है। अभी जेएनयू (जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) में भी ऐसी ही एक कोशिश हुई है। जेएनयू को भारत के उन चुनिंदा विश्वविद्यालयों में गिना जाता है जहाँ छात्र केवल अपने स्वार्थ के लिए नहीं पढ़ते हैं। यहाँ के छात्र मज़दूरों, अल्पसंख्यकों आदि के अधिकारों के लिए संघर्ष करने से कभी पीछे नहीं हटे हैं और उनकी इस प्रगतिशीलता से घबराने वाले सत्ताधारियों की भी कमी नहीं है। हाल में यहाँ के प्रशासन ने एक ऐसे नियम की घोषणा की है जिसका एकमात्र उद्देश्य छात्रों की गतिविधियों पर पाबंदी लगाना है। इस नियम के अनुसार छात्रों को होस्टल में कोई कार्यक्रम आयोजित करने के लिए प्रशासन से एक सप्ताह पहले अनुमति लेनी होगी। छात्रों को यह भी बताना होगा कि कार्यक्रम में कितने लोग शामिल होंगे। यही नहीं, उन्हें प्रशासन को यह भी ब

सत्ताधारी वर्ग पेट और भाषा से ऐसे खेलता है

पहले पेट की बात करते हैं। आजकल सरकार मटर की दाल का गुणगान करने में लगी हुई है। अरहर की दाल बहुत महँगी हो गई है और अब तो ऐसा लगता है कि आने वाले दिनों में केवल गंधर्व (सत्ताधारी) ही इस दाल से अपनी सेहत बना सकेंगे। किसानों को गरीबी के कारण आत्महत्या करने को मजबूर करने वाली सरकारों (केवल वर्तमान सरकार को दोष देना ठीक नहीं होगा) ने अब यह साफ़-साफ़ कह दिया है कि हमें मटर की दाल खाना शुरू कर देना चाहिए। सरकार हमें यह बताना चाहती है कि महँगाई के बढ़ने और उदारवादी आर्थिक नीतियों में कोई संबंध नहीं है। अब देखना यह है कि महँगाई पर रोक लगाने में असमर्थ सरकारें आने वाले सालों में हमें क्या-क्या खाने की सलाह देंगी। सत्ताधारी वर्ग को इस बात से कोई मतलब नहीं है कि जनता क्या खाना चाहती है। सत्ताधारी वर्ग गंधर्वों का जीवन जीता है। इस वर्ग के गंधर्वों को हम जैसे साधारण मनुष्यों से हमेशा यह शिकायत होती है कि हम तिल का ताड़ बनाते रहते हैं। गंधर्वों को लगता है कि किसान भूख या गरीबी के कारण आत्महत्या नहीं करता है। इन गंधर्वों का तलवा चाटने वाले सरकारी अधिकारी और पत्रकार हमें बताते हैं कि आत्महत्या की खबर