गुरुवार, 26 जून 2008

औरतों के "औरतीकरण" में कहानियों का योगदान

क्या आपने कभी यह सोचा है कि बचपन में दादी-नानी से सुनी गई कहानियाँ छोटे बच्चों के मन पर नकारात्मक प्रभाव भी डाल सकती हैं? ये कहानियाँ कल्पना की उड़ान-मात्र नहीं हैं।

मैं यहाँ सिर्फ़ भारत के प्रसंग में बात नहीं कर रहा हूँ। इन कहानियों में पूरी मानवता का सच छिपा होता है। इन कहानियों की दुनिया अविश्वसनीय लगती है, लेकिन इनमें जीवन का यथार्थ अपने बदले हुए रूप में होता है।

इन कहानियों में औरतों और लड़कियों के वर्णन पर गौर करने से बहुत-सी बातें सामने आती हैं। हमारे समाज में औरतों से यह अपेक्षा रखी जाती है कि वे आज्ञाकारिता, सेवा, विनम्रता आदि गुणों को अपने जीवन में सबसे अधिक महत्त्व दें। पुरुषों से कार्यकुशल, साहसी, समझदार आदि होने की अपेक्षा रखी जाती है। बच्चों को सुनाई जाने वाली कहानियों में औरतों को उसी रूप में प्रस्तुत किया जाता है जिसे समाज अपने लिए सुविधाजनक मानता है। सिमोन दी बोउआ ने कहा था कि औरतें पैदा नहीं होती, बल्कि बना दी जाती हैं । अगर आप कम उम्र की लड़की को ऐसी कहानियाँ सुनाएंगे जिसमें औरतों की आज्ञाकारिता और पुरुषों की कार्यकुशलता का वर्णन हो, तो आप उसे ऐसी औरत बनाने में पूरी तरह तरह सफल हो जाएंगे जिसे समाज "आदर्श बहू", "आदर्श बेटी" आदि कहकर बुलाएगा। यह औरत अपने व्यक्तित्व को पूरी तरह अपने परिवार में विलीन कर देगी। बच्चों की कहानियों में औरतों के वर्णन पर नीचे विचार किया गया है:

  1. अन्याय सहने वाली औरत: सिंड्रेला जैसी कहानियो में औरतों को बिल्कुल कमजोर दिखाया गया है। अपनी सौतेली माँ और बहनों की डांट-फटकार सुनने के बाद भी सिंड्रेला कुछ नहीं कहती है। वह चुपचाप अपने काम में लगी रहती है। अपनी परिस्थिति में बदलाव लाने के लिए वह कोई प्रयत्न नहीं करती है। उसके जीवन में सकारात्मक बदलाव तब आता है जब जादुई शक्ति से उसके कपड़े राजकुमारी जैसे हो जाते हैं। उन कपड़ों में वह इतनी सुंदर दिखती है कि एक राजकुमार को उससे प्यार हो जाता है और अंत में वह सिंड्रेला से शादी कर लेता है। इस कहानी में यह दिखाया गया है कि अन्याय सहना औरतों का गुण होता है। सिंड्रेला की सुंदरता उसकी किस्मत बदल देती है। अगर सिंड्रेला सुंदर नहीं होती, तो राजकुमार का दिल उस पर नहीं आता। क्या यह अच्छा नहीं होता कि राजकुमार सिंड्रेला की योग्यता और स्वभाव के कारण उसके प्रति आकर्षित होता? मगर हमारे समाज में आज भी औरतों का सुंदर और विनम्र होना उनके योग्य होने से अधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है। क्या हम छोटी बच्चियों को यह सीख देना चाहेंगे कि उनका जीवन किसी राजकुमार या अमीर इंसान से शादी करने के बाद ही सुखमय होगा? ऐसे कई सवाल हैं जिनके जवाब हमें देने होंगे। इन सवालों से बचकर निकल जाना तो बहुत आसान है, लेकिन ऐसा करना आने वाली पीढियों के लिए अच्छा नहीं होगा।
  2. दूसरों की शर्तों पर जीने वाली औरतें: इन कहानियों में औरतों को हमेशा अपने पतियों या पिताओं की आज्ञा का पालन करते हुए दिखाया जाता है। उनका अपना कोई व्यक्तित्व नहीं होता है। वे हर बात को आँख मूंदकर मान लेती हैं। एक कहानी में एक औरत अपने पिता के वचन को निभाने के लिए राक्षस से विवाह करने के लिए तैयार हो जाती है। क्या राक्षस से बचने के लिए किसी औरत का उससे विवाह करा देना ही एकमात्र समाधान है? राक्षसों को मारने की जिम्मेदारी पुरुषों को दी गई है। औरतें तो राक्षस का मन मोहकर ही उससे बच सकती है। ऐसी कहानियाँ पढ़कर ऐसा लगता है कि इनकी कल्पना औरतों ने ही की होगी।" राक्षस" जैसे पति से मुक्ति नहीं मिल पाने के कारण उनकी घुटन ऐसी कहानियों के माध्यम से बाहर निकलती होगी। लेकिन अपने बच्चों को इस तरह की कहानियाँ सुनाकर हम उनके वैचारिक विकास में बाधा उत्पन्न करेंगे।
  3. सुंदरता को सब-कुछ मानने वाली औरतें: ऐसी कई कहानियाँ हैं जिनमें औरतों का जीवन उनकी सुंदरता से बनता या बिगड़ता है। "नन्ही जलपरी" नामक कहानी में नायिका के पास अपने प्रेमी का दिल जीतने के लिए सिर्फ़ उसकी सुंदरता है। कहानी का एक पात्र उससे यह कहता है कि पुरुषों का दिल जीतने के लिए उनसे बात करना नहीं, बल्कि उनकी नज़र में सुंदर दिखना जरूरी है। ऐसी कहानियों से छोटी बच्चियों की मानसिकता पर क्या असर पड़ेगा? क्या औरतों का कोई व्यक्तित्व नहीं होता है? सुंदरता को इतना महत्त्व देने वाली नायिकाओं की कहानी सुनाकर हम बच्चों के दिल में यह बात बैठा देंगे कि जो औरत सुंदर नहीं है, वो जिंदगी में कोई बड़ा काम नहीं कर सकती हैं.

5 टिप्‍पणियां:

रंजू ranju ने कहा…

यही कहनियाँ वही संस्कार भर देती है जो नारी को कमजोर बनाते हैं ...मुझे लगता है कि अब कि कहानी कल्पना चावला या सुनीता विलियम्स की होनी चाहिए .यह तो हम लोगो को बदलना होगा ..तभी आने वाली पीढी इस से उभर सकेगी ..

Mired Mirage ने कहा…

यही नहीं पाठ्य पुस्तकों में भी स्त्री खाना बना रही होती है, पुरुष समाचारपत्र पढ़ रहा होता है। समय आ गया है कि बदलाव लाया जाए।
घुघूती बासूती

rachna ने कहा…

kabhie naari blog daekh kar apni pritkriyaa wahaan aaye aalekho per dae
link http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/

Neelima ने कहा…

लोक कथाओं का काम ही है मनुष्य का समाजीकरण करना ! स्त्री की समाज द्वारा विज्ञापित छवि को ही ये कथाएं दिखाती हैं !

सुजाता ने कहा…

बहुत सही कहा आपने । समाजिक संरचनाओं और समाजिक परम्पराओं को इसी तरह डीकोड करने की ज़रूरत है ।
धन्यवाद एक अच्छे आलेख के लिए !