सोमवार, 30 मार्च 2009

जब रामू काका है तो मेहनत क्यों?

कुछ दिन पहले एक विज्ञापन में किसी को यह कहते सुना : "जब रामू काका है तो मेहनत क्यों? जब सॉरी है तो ..." मेरे दिमाग में यह बात आई कि इस विज्ञापन के आधार पर हर उस व्यक्ति को मेहनत नहीं करनी चाहिए जिसके घर में कोई 'रामू काका' है। ऐसे विज्ञापनों से समाज को कैसा संदेश दिया जा रहा है? क्या मेहनत करना सिर्फ़ 'रामू काका' का काम है? क्या बाकी लोगों को सॉरी, थैंक्यू कहते हुए ही अपनी ज़िंदगी काटनी चाहिए?
दरअसल, इस स्थिति के लिए हमारा समाज जिम्मेदार है। कोई ऐसे विज्ञापनों पर सवाल नहीं उठाता है।
पहले रेडियो पर गानों के कार्यक्रम में दो-चार विज्ञापन आते थे। अब स्थिति यह हो गई है कि विज्ञापनों के बीच एक-दो गाने सुनने को मिल जाते हैं। विज्ञापनों का स्तर बहुत गिर गया है।

3 टिप्‍पणियां:

Anil ने कहा…

यकीन नहीं होता कि घर में सहायता करने वाले व्यक्तियों की अब यह इज्जत रह गयी है. इस विज्ञापन को तुरंत बंद करना होगा.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

मौजूदा समाज मेहनत करने वालों को नहीं उस से बचने वालों का सम्मान करती है। मेहनत और उस का फल तो यहां छीन लेने वाली चीज है।

MANVINDER BHIMBER ने कहा…

यकीन नहीं होता कि घर में सहायता करने वाले व्यक्तियों की अब यह इज्जत रह गयी है......बहुत अच्चा लिखा है