मंगलवार, 18 मई 2010

राजेश खन्ना पर वृत्तचित्र



एक दौर था जब राजेश खन्ना के नाम पर लोग मर-मिटने को तैयार थे। ज़ाहिर-सी बात है कि इन लोगों में लड़कियों की संख्या अधिक थी। एक बार सिनेमा हॉल में फ़िल्म देखते समय राजेश खन्ना के एक दीवाने पर मेरा ध्यान गया। वह हर दृश्य पर ऐसे झूम रहा था जैसे उसे किसी अलौकिक आनंद की प्राप्ति हो गई हो।

अब यह तो मनोविज्ञान या समाजशास्त्र के जानकार ही बताएँगे कि एक इनसान पूरे देश की धड़कन कैसे बन जाता है। राजेश खन्ना में ऐसी कौन-सी खूबियाँ थीं कि लोग उनके दीवाने हो गए थे?

इस वृत्तचित्र में राजेश खन्ना का आत्मविश्वास देखने लायक है। इस खूबी के साथ उनकी एक कमी भी दिखती है - उनका आत्मकेंद्रित स्वभाव।

भारत में स्टार के नखरों से अनजान विदेशी फ़िल्मकर्मी जब सही समय पर इंटरव्यू लेने पहुँचता है तो उसे यह मालूम हो जाता है कि इस देश में समय का सही या गलत होना स्टार तय करता है। बार-बार कोशिश करने के बाद जब वह इंटरव्यू लेने में कामयाब हो जाता है तो उसे धीरे-धीरे बॉलीवुड के बारे में ऐसी बातें मालूम होती हैं जिनका वह अंदाज़ा भी नहीं लगा सकता था।

हममें से अनेक लोग सत्तर के दशक में इस दुनिया में नहीं थे। ऐसे लोगों के लिए इस वृत्तचित्र का बहुत अधिक महत्व है। उस दौर को हमने केवल लोगों की बातों और किताबों से जाना है, लेकिन वृत्तचित्र देखते समय हम उस दौर को महसूस कर सकते हैं।

इस वृत्तचित्र में हम राजेश खन्ना के आत्मविश्वास को तब डगमगाते हुए देखते हैं जब उनकी फ़िल्में लगातार पिटने लगीं। इसमें हमें फ़िल्मी दुनिया के षड्यंत्रों की झलक भी देखने को मिलती है।

राजेश खन्ना के सभी प्रशंसकों से अनुरोध है कि वे हमें इस अभिनेता के सुनहरे दौर के बारे में कुछ बताएँ।

        

4 टिप्‍पणियां:

दिलीप ने कहा…

mujhe us daur ka to pata nahi...par jab bhi anand, amar prem, aaradhna, roti, ye sab filmein dekhta hun to yahi lagta hai ki unki superstar ka title bemaani nahi tha...

Naresh ने कहा…

मुंबई फिल्म उद्योग के उन सुपरस्टार की बात करें जो अपने आकर्षण से सम्मोहित करने की क्षमता रखते थे तो ६०-७० के दशक के राजेश खन्ना का नाम सबसे ऊपर आएगा. उनके आने से शम्मी, शशि, और न जाने कितनो का पत्ता कटा. उनका दौर शायद और चलता रहता मगर उसी दौरान एक और महान सुपरस्टार का फिल्म उद्योग में पदार्पण हुआ और सारी बाज़ी ही पलट गयी. मगर अपने चोटी के समय में उनका कोई सानी नहीं था. वह सही मायनों में एक सुपरस्टार थे..

नरेश चन्द्र बोहरा ने कहा…

मैं खुद राजेश खन्ना का जबरदस्त प्रशंसक हूँ. मैंने उनकी लगभग हर हिट फिल देखी है. हाथी मेरे साथी , आराधना, आनंद, अमर प्रेम , दो रस्ते, बावर्ची , दर्द, धनवान , थोड़ी सी बेवफाई , प्रेम नगर, प्रेम कहानी ....... एक लम्बी फेहरिस्त है. आज कितने ही अभिनेता खुद को सुपर स्तर कहलवाते हैं लेकिन आज तक जो रूतबा राजेश खन्ना का रहा है वैसा किसी का नहीं रहा. उनका व्यक्तिगत जीवन भले ही विवादस्पद रहा है लेकिन उनके जैसा रोमांटिक हीरो आज तक नहीं हुआ. अमिताभ भले ही उनसे अधिक ऊंचाई पर पहुंचे हैं लेकिन जितने कम वक्त में राजेश खन्ना ने जो छलांग लगाईं वैसी तो अमिताभ भी नहीं लगा पाए. राजेश खन्ना आज की पीढी को भी आकर्चित करते हैं. इसका मुख्य कारण है कि आजकल के अभिनेता अपनी कोई अलग शैली या स्टाइल पैदा नहीं कर सके हैं जिस पर जनता पागल हो जाय. उनका बोलने का ढंग और चेहरे पर आने वाले भाव आज भी रोमांचित कर जाते हैं.

Archana Verma ने कहा…

For those who were not around in 1960s-70s, see this song -

http://www.youtube.com/watch?v=ql1-jjEPErw

Making of such icons was a combined effort of the entire film industry - director, scriptwriter, camera crew, musician, play back singers, make-up artists, choreographers and hundreds of other professional involved in the making of a film.

That was an age when a film succeeded on the basis of melodious music, excellent photography and the image of the actor and the actress.

This was also an age when Indian film industry had the best of talents in all areas of film making.

Now we don't have that kind of music, that kind of sensitive direction and that kind of vision to make films.

There are only a few actors who are really intelligent and dedicated.

The rest only make a rehash of the films being made in other countries.

Creativity has gone out of the films now.